दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र सियाचिन है। यहां दुश्मन से ज्यादा मौसम बैरी होता है। दिन का तापमान शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस नीचे तो रात का तापमान शून्य से 70 डिग्री सेल्सियस नीचे चला जाता है। सियाचिन हिमानी या सियाचिन ग्लेशियर हिमालय की पूर्वी काराकोरम पर्वतमाला में भारत-पाक नियंत्रण रेखा के पास स्थित एक ग्लेशियर है। यह काराकोरम की पांच बड़ी हिमानियों में सबसे बड़ा और ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर विश्व की दूसरी सबसे बड़ी हिमानी है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई इसके स्रोत इंदिरा कोल पर लगभग 5,753 मीटर और अंतिम छोर पर 3,620 मीटर है।
दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र 'सियाचिन' जहां दुश्मन से ज्यादा बैरी है मौसम, पढ़ें जांबाजों के किस्से
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सेना के साहस का नया चेहरा बनकर उभरे हनुमंथप्पा की दिलेरी को देश ने देखा और सुना ही है। आज देश के उन जवानों के शौर्य की कहानियां सुनिए जो सियाचिन ग्लेशियर की सोनम पोस्ट पर तैनात होकर देश की सेवा में शौर्य की गाथा लिखते हैं। दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र में तैनात टीम में ‘रैंबो’ से लेकर ‘ऑल इन वन’ तक थे। इन जवानों को मुश्किल हालातों में जाना, जूझना और फिर जीतकर निकलना पसंद था। इसी आदत की वजह से इन 10 जवानों को भारत के सबसे दुर्गम इलाके की रखवाली करने के लिए भेजा गया था।
जूनियर कमिशंड ऑफिसर सूबेदार नागेश टीटी को उनके साथी रैंबो के नाम से याद करते हैं। वह अपने साथ दूसरों के हथियार भी उठाकर लोड कर देते थे। रोमांच का चस्का था और इसलिए बेहतरीन ग्रेड के साथ पैरा मोटर कोर्स कर लिया।
22 सालों की नौकरी में 12 साल कठिन हालात वाली जगहों पर रहे। इस दौरान ऑपरेशन पराक्रम और जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन रक्षक में हिस्सा लिया। तीन साल एनएसजी में रहे और फिर ऑपरेशन राइनो के लिए 2009 से 2012 के बीच पूर्वोत्तर चले गए। हनुमंथप्पा की तरह उन्होंने भी अपनी पसंद से कठिन पोस्ट पर जाना पसंद किया और रैंबो की तरह हर जगह से जीत कर लौटे।
हवलदार ईलुमलाई एम की कहानी भी ऐसी ही है। वह खुद आगे बढ़कर काम हाथ में ले लेते थे और फिर उसे पूरा करके ही मानते। उन्होंने 28 अक्तूबर 1996 में मद्रास रेजीमेंट की 19वीं बटालियन ज्वाइन की थी। उन्होंने नौ साल फील्ड सर्विस की और इस दरम्यान जम्मू-कश्मीर तथा पूर्वोत्तर में आतंकियों के खिलाफ कई छोटे सफल ऑपरेशन की कमान संभाली। वह आगे बढ़कर नेतृत्व करते थे और इसीलिए उन्हें सोनम पोस्ट जाने वाली टीम का हिस्सा बनाया गया। उन्होंने मद्रास रेजीमेंटल सेंटर में कई प्रशिक्षुओं को ट्रेनिंग भी दी।