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World Sight Day Today: ‘आंखों से प्यार’ करना सीखेंगे तभी बच पाएगी रोशनी.. देश में 1.8 करोड़ लोग हैं दृष्टिहीन

Thu, 14 Oct 2021 05:56 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Thu, 14 Oct 2021 05:56 AM IST
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World Sight Day today: Learn to love eyes, only then light will be saved, There are 18 million blind people in the country
eye sight

कोरोना महामारी में ब्लैक फंगस आंखों के नए दुश्मन के रूप में सामने आया है। ऑनलाइन पढ़ाई, ऑनलाइन काम, ऑनलाइन मीटिंग, ऑनलाइन खरीदारी और ऑनलाइन एंटरटेनमेंट समेत अन्य तौर तरीकों के कारण स्क्रीन को ज्यादा समय देने से आंखों के लिए जोखिम बढ़ा है। आज विश्व दृष्टि दिवस है। डब्ल्यूएचओ ने आंखों के प्रति बढ़ते जोखिम को देख इस बार की थीम ‘लव योर आईज’ (अपनी आंखों से प्यार करें) रखी है। इसका मकसद लोगों को यह बताना है कि वे सतरंगी दुनिया की छवियां दिखाने वाली अपनी आंखों को कैसे सहेजकर अपनी रोशनी सुरक्षित रख सकते हैं...



यूं दिखते हैं बीमारी के इशारे
आंखों में दबाव, थकान महसूस होना, दूर या पास की चीज साफ न दिखाई देना, आंखों में सूखापन, कम रोशनी में दिखाई न देना, आंख में दर्द महसूस होना, धुंधला दिखाई देना, आंख में लालिमा और पानी आना, आंख में खुजली और जलन होना और एक ही चीज दो-दो दिखना खतरे के संकेत हैं।

तकलीफ न करें नजरअंदाज
एम्स नई दिल्ली के कम्युनिटी ऑप्थैल्मोलॉजी के ऑफिसर इंचार्ज डॉ. प्रवीण वशिष्ठ बताते हैं कि देश में लोग आंखों की तकलीफ को गंभीरता से नहीं लेते हैं। देश में 65 से 66 फीसदी लोगों की आंख की रोशनी जाने का कारण सफेद मोतियाबिंद होता है, जिसे टाला जा सकता है। 40 वर्षों के अध्ययन में हमने पाया है कि शहरों में 100 में से 12 से 13 बच्चों को चश्मे की जरूरत पड़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में ये दर आठ फीसदी है। समय पर बच्चों की आंख की न तो जांच होती है और न ही चश्मा लगता है।

World Sight Day today: Learn to love eyes, only then light will be saved, There are 18 million blind people in the country
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

50 से 60 हजार नेत्रदान जरूरत दो लाख की
कॉर्नियल ब्लाइंडनेस का कारण आंख में गंभीर संक्रमण, चोट लगना या पोषक तत्त्वों की कमी से हो सकता है। इन रोगियों को नेत्र प्रत्यारोपण से ही नई रोशनी मिल सकती है। देश में हर साल दो लाख नेत्रदान की जरूरत है। लेकिन 50 से 60 हजार नेत्रदान हर साल होते हैं। इसमें से 40 फीसदी ही प्रत्यारोपण लायक होती हैं।

डॉ. वशिष्ठ बताते हैं कि दुनिया में अल्प दृष्टि दोष के 80 फीसदी मामले आते हैं, जिसे चश्मे से ठीक किया जा सकता है। हर साल करीब 50 हजार बच्चे जन्मजात दृष्टिहीन पैदा होते होते हैं। नेत्र तकलीफों को अच्छे खानपान और उपचार से ठीक किया जा सकता है। काला मोतियाबिंद, ग्लूकोमा में नजर वापस नहीं आती है।

बच्चों में नजर सुधार की जरूरत
मुंबई के कोकिला बेन अस्पताल की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. श्रुति वासनिक बताती हैं, देश में 18 वर्ष से कम उम्र के 41 फीसदी बच्चों को विजन करेक्शन (नजर सुधार) की जरूरत होती है, पर अभिभावक नजरअंदाज करते हैं। 42 फीसदी कर्मचारी और 45 फीसदी से अधिक बुजुर्ग नजर की तकलीफ नजरअंदाज करते हैं। डॉ. श्रुति बताती हैं कि स्क्रीन टाइम कई गुना बढ़ गया है। 

ऐसे में आंखों की सेहत के लिए हर किसी को 20-20-20 के फॉर्मूले को अपनाना चाहिए। कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल पर काम कर रहे हैं तो हर 20 मिनट पर उठें और बीस फुट दूर तक 20 सेकंड के लिए देखें। इससे आंखों पर पड़ने वाला दबाव कम होगा। आंखों में ड्राइनेस या जलन होती है तो आर्टिफिशियल टियर्स ड्रॉप लगा सकते हैं।

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eye - फोटो : Pixabay

महामारी के कारण नेत्र संबंधी विकार बढ़े
जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग के प्रो. किशोर कुमार बताते हैं कि स्क्रीनटाइम बढ़ने से नेत्ररोगियों की संख्या बढ़ी है। एक रिपोर्ट में महामारी में 27.5 करोड़ लोगों की नजर कमजोर होने की बात सामने आई है। मधुमेह रोगी सर्वाधिक प्रभावित हैं। डॉ. किशोर के मुताबिक, 4 से 5 साल के बच्चे तकलीफ के बारे में नहीं बता पाते हैं। ऐसे में बच्चा बार-बार आंख मल रहा है, आंख में लालिमा है, पानी आ रहा है, किताब पास रखकर पढ़ रहा है या लिख रहा है तो अभिभावक सतर्क हो जाएं।

कमजोर इम्युनिटी वालों को सतर्कता जरूरी
कोरोना महामारी के बीच मधुमेह रोगी या कमजोर इम्युनिटी वाले सावधान रहें, क्योंकि ब्लैक फंगस (म्यूकॉरमायकोसिस) ऐसे लोगों को अपना शिकार बना आंखों पर हमला बोलता है। ब्लैक फंगस के 45,432 से अधिक मामले सामने आए हैं। 4200 से अधिक लोगों की जान गई, जबकि हजारों लोगों की जान बचाने के लिए डॉक्टरों को उनकी आंख तक निकालनी पड़ी है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : insatgram

दुनियाभर में आंखों की सेहत...

  • 222 करोड़ लोगों को विश्व में है आंखों से जुड़ी तकलीफें
  • सौ करोड़ लोगों की तकलीफ समय पर उपचार से ठीक हो सकती है
  • 50  वर्ष से अधिक उम्र में ज्यादातर को दृष्टिदोष
  • 10 में से सात लोग नियमित जांच नहीं करवाते
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixa

चार ‘पी’ से बचाएं रोशनी

  • प्रिवेंट (बचाव) : विटामिन ए के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, पालक, अंडा, गाजर इत्यादि खाएं। ये कॉर्निया के साथ आंखों के अगले भाग, रेटिना और भीतरी हिस्से को स्वस्थ रखता है। मोतियाबिंद से बचाने वाले विटामिन सी के लिए संतरा, नींबू, टमाटर खाएं। विटामिन-ई के लिए बादाम खाएं। ओमेगा 6+ और ओमेगा 3 फैटी एसिड्स से ‘ड्राई आई’ नहीं होगी।
  • प्रोटेक्ट (सुरक्षा) : सूर्य की अल्ट्रावॉयलेट किरणों या अन्य प्रदूषणों से आंख को बचाने के लिए चश्मा पहनें। मेकअप प्रोड्क्टस में गंदगी से आंखों में सूखापन हो सकता है। कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल को आंख से एक हाथ की दूरी पर रखकर चलाएं। कंप्यूटर विजन सिंड्रोम या डिजिटल आई स्ट्रेन संभव है।
  • प्रिजर्व (संरक्षण) : साफ-सफाई का ख्याल रखें। दूसरे व्यक्ति का चश्मा इस्तेमाल न करें। लेंस के उपयोग में हाईजीन का ध्यान रखें। ऐसे उत्पादों से संक्रमण का खतरा अधिक है। नजर कमजोर पड़ रही है या आंख में धुंधलापन महसूस हो रहा है तो बिना देर किए डॉक्टर से मिलें। अपने मन से दवा इस्तेमाल न करें।
  • प्रायोरिटाइज (प्राथमिकता) : हर दो साल में आंखों की जांच कराएं। 40 से अधिक उम्र वाले साल में एक बार जांच जरूर करवाएं। परिवार में ग्लूकोमा, मधुमेह, हाइपरटेंशन है तो सतर्क रहें। पहले से चश्मा पहनते हैं और चश्में का नंबर अधिक है तो अपने डॉक्टर से नियमित जांच कराते रहें। आंख में लालिमा हो तो बिलकुल देरी न करें।
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