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एमसीयू में विवेकानंद पर विशेष उद्बोधन: मुकुल कानिटकर बोले- युवा शिकायत नहीं, समस्याओं का समाधान देता है
Fri, 11 Sep 2026 09:59 PM IST
देवेश त्रिपाठी
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Fri, 11 Sep 2026 09:59 PM IST
सार
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की स्मृति में विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ। 'युवा भारत : कल, आज और कल' विषय पर वक्ता मुकुल कानिटकर ने युवाओं को आत्मचिंतन, साहस और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का संदेश दिया।
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एमसीयू में स्वामी विवेकानंद के शिकागो व्याख्यान विषय पर विशेष उद्बोधन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
कौन है तू, कहां से आया है, तेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? जो इस प्रश्न का सामना करता है और उत्तर खोजता है, वह युवा है। वह महापुरुष है। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, मीराबाई और एपीजे अब्दुल कलाम ने ये प्रश्न पूछे तो उनके जीवन बदल गए। प्रत्येक युवा को आईना देखते समय ये प्रश्न स्वयं से पूछने चाहिए। यह विचार प्रखर वक्ता मुकुल कानिटकर ने व्यक्त किए।
स्वामी विवेकानंद के शिकागो व्याख्यान की स्मृति में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने की। आखिर में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान भी कानिटकर ने किया।
अमेरिका में विवेकानंद के संबोधन पर तालियों की क्या थी वजह?
'युवा भारत : कल, आज और कल' विषय पर मुकुल कानिटकर ने कहा, ''जब स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित धर्म सम्मेलन को संबोधित किया तो बहुत देर तक तालियां बजती रहीं। इसका कारण यह नहीं था कि उन्होंने वहां उपस्थित श्रोताओं को 'भाइयों-बहनों' कहकर संबोधित किया। अपितु उसके पीछे भावपूर्ण अभिव्यक्ति थी।''
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उन्होंने कहा, ''शिकागो व्याख्यान से पूर्व अमेरिका पहुंचे स्वामी विवेकानंद ने डेढ़ महीने अथाह कष्ट सहन किया। अपमान और तिरस्कार का विषपान किया। इतना कष्ट और अपमान झेलने के बाद भी जब स्वामी विवेकानंद को बोलने के लिए मंच मिला, तो उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। आत्मीयता से कहा- "मेरे प्यारे अमेरिकी बहनों और भाइयों"। उनकी इस भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने वहां उपस्थित सभी लोगों पर प्रभाव छोड़ा। एक प्रकार से स्वामी विवेकानंद ने सबके मन पर शक्तिपात किया।''
कानिटकर बोले- शक्तिहीन करते हैं शिकायत, युवा देते हैं समाधान
कानिटकर ने कहा, ''जो शक्तिहीन होता है, वह शिकायत करता है। युवा तो समाधान देता है। युवा यानी साहस से भरपूर। स्वामी विवेकानंद आज भी युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं क्योंकि उन्होंने कभी शिकायत नहीं की।'' उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद का ऐसा प्रभाव हुआ कि विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद के 7 भाषण हुए। बाद में, उनके भाषणों पर अनुसंधान हुए।''
मुकुल कानिटकर ने युवाओं से आह्वान किया कि कोई भी सामान खरीदते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि हम स्वदेशी या मित्र देश के उत्पाद खरीदें। आधुनिकता को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा, ''आधुनिकता तो उपकरण और तकनीक की होती है, संस्कृति की नहीं। संस्कृति तो निरंतरता में चलती है। संस्कृति और आधुनिकता साथ-साथ चलती है। हमें अपनी संस्कृति का संरक्षण करते हुए विचारों से आधुनिक होना चाहिए।''
क्या बोले कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी?
वहीं, अध्यक्षीय उद्बोधन एवं स्वागत भाषण में कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि 11 सितंबर, 1893 में अमेरिका में ऐसा कुछ हुआ कि दुनिया को भारत का नया परिचय मिला। स्वामी विवेकानंद के विचारों ने भारत को देखने का दृष्टिकोण बदल दिया। स्वामी विवेकानंद का चयन उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने किया था।
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स्वामी विवेकानंद के शिकागो व्याख्यान की स्मृति में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने की। आखिर में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान भी कानिटकर ने किया।
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अमेरिका में विवेकानंद के संबोधन पर तालियों की क्या थी वजह?
'युवा भारत : कल, आज और कल' विषय पर मुकुल कानिटकर ने कहा, ''जब स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित धर्म सम्मेलन को संबोधित किया तो बहुत देर तक तालियां बजती रहीं। इसका कारण यह नहीं था कि उन्होंने वहां उपस्थित श्रोताओं को 'भाइयों-बहनों' कहकर संबोधित किया। अपितु उसके पीछे भावपूर्ण अभिव्यक्ति थी।''
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उन्होंने कहा, ''शिकागो व्याख्यान से पूर्व अमेरिका पहुंचे स्वामी विवेकानंद ने डेढ़ महीने अथाह कष्ट सहन किया। अपमान और तिरस्कार का विषपान किया। इतना कष्ट और अपमान झेलने के बाद भी जब स्वामी विवेकानंद को बोलने के लिए मंच मिला, तो उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। आत्मीयता से कहा- "मेरे प्यारे अमेरिकी बहनों और भाइयों"। उनकी इस भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने वहां उपस्थित सभी लोगों पर प्रभाव छोड़ा। एक प्रकार से स्वामी विवेकानंद ने सबके मन पर शक्तिपात किया।''
कानिटकर बोले- शक्तिहीन करते हैं शिकायत, युवा देते हैं समाधान
कानिटकर ने कहा, ''जो शक्तिहीन होता है, वह शिकायत करता है। युवा तो समाधान देता है। युवा यानी साहस से भरपूर। स्वामी विवेकानंद आज भी युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं क्योंकि उन्होंने कभी शिकायत नहीं की।'' उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद का ऐसा प्रभाव हुआ कि विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद के 7 भाषण हुए। बाद में, उनके भाषणों पर अनुसंधान हुए।''
मुकुल कानिटकर ने युवाओं से आह्वान किया कि कोई भी सामान खरीदते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि हम स्वदेशी या मित्र देश के उत्पाद खरीदें। आधुनिकता को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा, ''आधुनिकता तो उपकरण और तकनीक की होती है, संस्कृति की नहीं। संस्कृति तो निरंतरता में चलती है। संस्कृति और आधुनिकता साथ-साथ चलती है। हमें अपनी संस्कृति का संरक्षण करते हुए विचारों से आधुनिक होना चाहिए।''
क्या बोले कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी?
वहीं, अध्यक्षीय उद्बोधन एवं स्वागत भाषण में कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि 11 सितंबर, 1893 में अमेरिका में ऐसा कुछ हुआ कि दुनिया को भारत का नया परिचय मिला। स्वामी विवेकानंद के विचारों ने भारत को देखने का दृष्टिकोण बदल दिया। स्वामी विवेकानंद का चयन उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने किया था।