देश में सिक्कों का चलन छठी शताब्दी ईसा पूर्व में शुरु हुआ था। उस समय इन्हें पुराण और पना भी कहा जाता था। भारत में जितने साम्राज्य हुए उतने ही अलग-अलग तरह के सिक्कों का अविष्कार हुआ यानी हर राजा के शासन काल के दौरान उस राजा द्वारा अपने साम्राज्य की प्रतिष्ठा वाले सिक्कों को चलाया गया। कभी लोहा, तांबा तो कभी चांदी, फिर सोना से होते हुए स्टील तक का सफर हजारों वर्षों में तय किया है।
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राजकीय बौद्ध संग्रहालय में रखे प्राचीन सिक्के।
- फोटो : राजकीय बौद्ध संग्रहालय।
सिक्कों की इस यात्रा का लुत्फ आप गोरखपुर के राजकीय बौद्ध संग्रहालय में उठा सकते हैं। जहां छठी शताब्दी यानी तकरीबन 3 हजार साल पहले इस्तेमाल किए जाने वाले आहत सिक्के के साथ समुद्रगुप्त, मुगलशासकों के शासन काल में इस्तेमाल किए जाने वाले सिक्कों का समृद्ध संग्रह मौजूद हैं।
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राजकीय बौद्ध संग्रहालय में रखे प्राचीन सिक्के।
- फोटो : राजकीय बौद्ध संग्रहालय।
बौद्ध संग्रहालय के उपनिदेशक डॉ. मनोज गौतम ने बताया कि इन सभी के काल में बने सिक्कों पर अलग अलग तरह के चिह्न बने होते थे। इसके अलावा मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य ने सोने, चांदी के अलावा तांबे और शीशे के सिक्के चलाए।
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राजकीय बौद्ध संग्रहालय में रखे प्राचीन सिक्के।
- फोटो : राजकीय बौद्ध संग्रहालय।
कुषाण राजाओं के शासन काल के दौरान जारी किए गए सिक्कों में तस्वीरें बनकर आने लगी। इस सिक्कों पर एक तरफ राजा अपनी छवि अंकित कराते थे और दूसरी तरफ उनके ईष्ट देवी देवताओं की तस्वीरें छपी हुआ करती थी।
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राजकीय बौद्ध संग्रहालय में रखे प्राचीन सिक्के।
- फोटो : राजकीय बौद्ध संग्रहालय।
हालांकि दिल्ली में मुगलों के आगमन के बाद सिक्कों पर से राजाओं और देवी देवताओ की तस्वीरें हटा दी गई और उसकी जगह इस्लामी कैलिग्राफी लिखी जाने लगी। इन सिक्कों को टंका कहा जाता था। इस तरह के अलग अलग मूल्य वाले कई टंका यानी सिक्के मुगलों ने बाजार में उतारें।