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28 साल पहले एक मुट्ठी रेत लाने की बात से नाराज हुए थे कारसेवक, नेता भी नहीं भांप सके थे इनकी नाराजगी

Fri, 02 Oct 2020 09:13 AM IST
vivek shukla टीपी शाही, गोरखपुर।
टीपी शाही, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Fri, 02 Oct 2020 09:13 AM IST
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story of Ayodhya Masjid demolition disputed structure Broken down by karsevak
छह दिसंबर 1992 में अयोध्या में कारसेवा करने वालों ने साझा किया अनुभव। - फोटो : अमर उजाला।

छह दिसंबर 1992 को अयोध्या पहुंचे कारसेवक प्रतीकात्मक कार सेवा की घोषणा से बेहद आक्रोश में थे। गोरखपुर से अयोध्या गए आरएसएस के तत्कालीन जिला कार्यवाह बलदेव यादव बताते हैं कि कहा गया था कि सभी कारसेवक सरयू नदी में स्नान करेंगे और एक मुट्ठी रेत लेकर आएंगे। कारसेवकों को बात जमी नहीं और वे मौका पाते ही विवादित ढांचे पर टूट पड़े। नेता रोकते रहे, मगर किसी ने एक नहीं सुनी और कारसेवक मलबे की ईंट तक उठा ले गए।

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कारसेवक बलदेव यादव। - फोटो : अमर उजाला।

बलदेव यादव भी छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों के एक समूह का नेतृत्व कर रहे थे। उनका कहना है कि लाखों की संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंचे थे। हर रोज मंच से नेताओं का भाषण होता था। मंच से एलान हुआ कि छह दिसंबर को कारसेवक सरयू नदी में स्नान करेंगे और एक मुट्ठी रेत लेकर आएंगे। यही प्रतीकात्मक कारसेवा होगी। नेताओं की इस बात से कारसेवक उबल पड़े। सब कहने लगे अयोध्या बुलाकर बरगलाया जा रहा है। अलग-अलग टोलियों में कारसेवक सरयू नदी में स्नान करने गए। जब लौटने लगे तो आक्रोश बढ़ गया। देखते ही देखते कारसेवकों का जत्था विवादित ढांचे की तरफ मुड़ गया। बैरिकेडिंग तोड़कर विवादित ढांचे के गुंबद पर चढ़ गए। तीन घंटे के अंदर पूरे ढांचे को ध्वस्त कर दिया गया, फिर मलबा हटाया जाने लगा। लाखों लोग उस ढांचे से ईंट भी उठा ले गए। इसका मकसद कारसेवा को यादगार बनाना था। मलबा हटाने के बाद रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी गई।

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कारसेवक रामउग्रह शाही। - फोटो : अमर उजाला।

कारसेवकों को रोक रहे थे नेता
कारसेवक (विहिप के नेतृत्वकर्ता) रामउग्रह शाही ने बताया कि नेता तो कारसेवकों को रोक रहे थे। वे कह रहे थे कि कानून को हाथ में मत लो। गुंबद को मत तोड़ो। आडवाणी, जोशी, अशोक सिंघल, उमा भारती सहित हर प्रमुख नेता नहीं चाहता था कि ढांचा ढहाया जाए, लेकिन कारसेवक किसी की बात सुनने को तैयार नहीं थे। यही वजह थी कि विवादित ढांचा तुरंत ढहा दिया गया। विवादित ढांचे की ईंट कहां गई, किसी को नहीं पता चला।

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कारसेवक सत्यप्रकाश त्रिपाठी। - फोटो : अमर उजाला।

किसी की बात सुनने को तैयार नहीं थे कारसेवक
गरयाकोल गांव के कारसेवक सत्यप्रकाश त्रिपाठी ने बताया कि जब कारसेवक सरयू नदी में स्नान करके रामजन्म भूमि की तरफ बढ़ने लगे, तब हजारों कारसेवक यही कह रहे थे किसी की बात सुनने की जरूरत नहीं है। अपमान का बदला लेना है। कोई ऐसा नहीं था, जो यह कह रहा हो कि प्रतीकात्मक कारसेवा की जाएगी। हर किसी के जेहन में था कि जब कारसेवा के लिए बुलाया गया है तो वास्तव में कारसेवा होगी। भाजपा नेताओं के चिल्लाने के बाद भी कारसेवक गुंबद पर चढ़ गए। उसे ध्वस्त कर दिया। विवादित ढांचे की ईंट आज भी हमारे घर में पड़ी है।

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कारसेवक राम नगीना राव। - फोटो : अमर उजाला।

ढांचा ढहा तो विनय कटियार आश्चर्यचकित
कारसेवक राम नगीना राव ने बताया कि जिस समय विवादित ढांचा ढहाया जा रहा था, उस वक्त पुलिस खामोश थी। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और उनका स्पष्ट आदेश था कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलेगी। जब कारसेवकों का जत्था राम जन्मभूमि की तरफ बढ़ रहा था तो रास्ते में उनके साथ कई पुलिस की टुकड़ियां भी चल रही थीं। ढांचा गिराए जाने के बाद जब रामलला की मूर्ति स्थापित की जाने लगी तो राजमाता सिंधिया भी कारसेवा करने आ गईं। जब कारसेवा करके वापस आ रहे थे, तब विनय कटियार रास्ते मिले थे। अपनी मारुति वैन से जा रहे थे। हाथ में ईंट देखकर पूछा क्या हुआ? जब बताया कि विवादित ढांचा ढह गया तो वह आश्चर्यचकित रह गए। 

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