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जयंती विशेष:रामप्रसाद बिस्मिल ने फांसी से तीन दिन पहले इस जेल में पूरी की थी आत्मकथा

Thu, 11 Jun 2020 08:11 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Thu, 11 Jun 2020 08:11 PM IST
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Special on birth anniversary of Pandit Ramprasad Bismil story
राम प्रसाद बिस्मिल - फोटो : amarujala

काकोरी कांड के महानायक पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की आज जयंती है। 11 जून 1897 को उन्होंने यूपी के शाहजहांपुर में जन्म लिया था। पूरा देश उन्हें बड़ी शिद्दत से याद करता है। वहीं गोरखपुर के लिए बिस्मिल एक अलग पहचान हैं। अपने जीवन के आखिरी चार महीने और दस दिन उन्होंने यहां की जिला जेल में बिताए थे। यह वक्त उनके आध्यात्मिक सफर का भी अंतिम पड़ाव था। फांसी के तीन दिन पहले ही उन्होंने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय पूरा किया था। 19 दिसंबर 1927 की सुबह 6:30 बजे गोरखपुर जिला जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की और मंत्र पढ़ते हुए फंदे पर झूल गए।



 

Special on birth anniversary of Pandit Ramprasad Bismil story

उनके जानने वाले बताते हैं कि अंतिम दिनों में गोरखपुर जेल उनकी साधना का केंद्र बन गई थी। 30 साल के जीवनकाल में उनकी कुल 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं थीं, जिनमें ज्यादातर अंग्रेजों ने नष्ट करा दीं। गोरखपुर जेल में रहकर उन्होंने बहुत सारी रचनाएं भी लिखीं लेकिन उसे भी जेल प्रशासकों ने जलवा दिया। बिस्मिल अंग्रेजों की इस करतूत से वाकिफ थे, तभी तो उन्होंने फांसी के पहले उनकी आत्मकथा किसी मिलने आए करीबी के हाथ बाहर भिजवा दी थी।

Special on birth anniversary of Pandit Ramprasad Bismil story
राम प्रसाद बिस्मिल - फोटो : डेमो

कोठरी संख्या सात में रहते थे बिस्मिल
बिस्मिल को छह अप्रैल 1927 को काकोरी कांड का अभियुक्त मानते हुए सजा सुनाई गई। वे पहले लखनऊ जेल में रखे गए। इसके बाद उन्हें अंग्रेजों ने 10 अगस्त को 1927 को गोरखपुर जेल भेज दिया। यहां वे कोठरी संख्या सात में रहते थे। इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष के नाम से जाना जाता है।

एकादशी के दिन जन्म और इसी दिन बलिदान
बिस्मिल बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नियमित पूजा-पाठ उनके जीवन का हिस्सा था। उनका जन्म एकादशी के दिन हुआ था और एकादशी के ही दिन वे बलिदान हुए। यह महज संयोग नहीं था बल्कि उनकी धार्मिक प्रवृत्ति की बड़ी वजह भी थी।

 

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राम प्रसाद बिस्मिल अंतिम दिनों में इसी जगह पर बंदी रहे। - फोटो : अमर उजाला
शस्त्र के लिए किया था काकोरी कांड

चौरीचौरा कांड के बाद अचानक असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया। इसके कारण देश में फैली निराशा को देखकर उनका कांग्रेस के आजादी के अहिंसक प्रयत्नों से मोहभंग हो गया। फिर तो नवयुवकों की क्रांतिकारी पार्टी का अपना सपना साकार करने के क्रम में बिस्मिल ने चंद्रशेखर ‘आजाद’ के नेतृत्व वाले हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ गोरों के सशस्त्र प्रतिरोध का नया दौर आरंभ किया लेकिन सवाल था कि इस प्रतिरोध के लिए शस्त्र खरीदने को धन कहां से आये? इसी का जवाब देते हुए उन्होंने नौ अगस्त, 1925 को अपने साथियों के साथ एक ऑपरेशन में काकोरी में ट्रेन से ले जाया जा रहा सरकारी खजाना लूटा तो थोड़े ही दिनों बाद 26 सितंबर, 1925 को पकड़ लिए गए और लखनऊ की सेंट्रल जेल की 11 नंबर की बैरक में रखे गए। मुकदमे के नाटक के बाद अशफाक उल्लाह खान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रौशन सिंह के साथ उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई।

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इस जेल में दी गई थी राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी - फोटो : अमर उजाला

मौत के डर से नहीं मां, तुमसे बिछड़ने के शोक में आए हैं आंसू
पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की माता मूलरानी ऐसी वीरमाता थीं जिनसे वे हमेशा प्रेरणा लेते थे। शहादत से पहले ‘बिस्मिल’ से मिलने गोरखपुर वे जेल पहुंचीं तो पंडित बिस्मिल की डबडबाई आंखें देखकर भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया। कलेजे पर पत्थर रख लिया और उलाहना देती हुई बोलीं, ‘अरे, मैं तो समझती थी कि मेरा बेटा बहुत बहादुर है और उसके नाम से अंग्रेज सरकार भी थरथराती है। मुझे पता नहीं था कि वह मौत से इतना डरता है। उनसे पूछने लगीं, ‘तुझे ऐसे रोकर ही फांसी पर चढ़ना था तो तूने क्रांति की राह चुनी ही क्यों? तब तो तुझे तो इस रास्ते पर कदम ही नहीं रखना चाहिए था।’ इतिहासकार बताते हैं कि इसके बाद ‘बिस्मिल’ ने बरबस अपनी आंखें पोंछ डालीं और कहा था कि उनके आंसू मौत के डर से नहीं, उन जैसी बहादुर मां से बिछड़ने के शोक में बरबस निकल आए थे।
 

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