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कारगिल विजय दिवस: 'कुरबान हुआ तेरी असमत पे, मैं कितना नसीबा वाला था'

Tue, 26 Jul 2022 10:00 AM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर।
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Tue, 26 Jul 2022 10:00 AM IST
सार

शहीद शिव सिंह छेत्री के अंतिम दर्शन को पूरा गोरखपुर उमड़ पड़ा था। बाद में उनके नाम पर बिछिया में मुख्य मार्ग बनाया गया। एक जुलाई 2001 को उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह प्रतिमा आज भी शहर के नौजवानों को देश के लिए मर-मिटने की प्रेरणा देती है।

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Kargil Vijay Diwas speciel story on Shiv Singh Chhetri and gautam gurung
शहीद शिव सिंह छेत्री के पिता गोपाल छेत्री। - फोटो : अमर उजाला।

ओ वतना वे, मेरे वतना वे। तेरा मेरा प्यार निराला था। कुरबान हुआ तेरी असमत पे, मैं कितना नसीबा वाला था। फिल्म केसरी का ये गाना महज 23 साल की उम्र में कारगिल युद्ध के दौरान अपने प्राण न्योछावर करने वाले राईफल मैन शिव सिंह छेत्री पर फबता है। बेटे को खोने का दुख तो परिवार को ताउम्र रहेगा, मगर बेटा ऐसा काम कर गया कि सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।



बिछिया में अपने दो और बेटों के साथ रहने वाले पिता गोपाल छेत्री की आंखें आज भी शहीद बेटे शिव सिंह छेत्री का जिक्र होते ही नम हो जाती हैं। 11 मई को उनकी पत्नी और शिव सिंह छेत्री की मां गीता देवी ने भी शरीर त्याग दिया। वे कहते हैं बेटे के जाने का गम तो है लेकिन देश के लिए उसने जो कर दिखाया उस पर गर्व है।
 

Kargil Vijay Diwas speciel story on Shiv Singh Chhetri and gautam gurung
शहीद शिव सिंह छेत्री। - फोटो : अमर उजाला।

कहा, पूरा शहर मुझे मेरे बेटे के नाम से जानता है, एक माता-पिता के लिए इससे अनमोल उपलब्धि कुछ नहीं हो सकती। मैं तो ऊपर वाले से दुआ करता हूं। जब भी मुझे जीवन मिले, शिव का पिता बनने का सौभाग्य मिले। कारगिल में शहीद होने वाले शिव सिंह छेत्री का बचपन बिछिया में बीता। 10वीं तक की पढ़ाई नेहरू इंटर कॉलेज से करने के बाद इंटरमीडिएट के लिए उन्होंने एमपी इंटर कॉलेज को चुना। अपने बैच के सबसे होनहार छात्र शिव सिंह छेत्री शिक्षकों और दोस्तों के प्रिय थे। पिता नेे बताया कि बचपन से सेना में जाने की इच्छा रखने वाले शिव सिंह छेत्री ने जब 11वीं में दाखिला लिया तो इस दौरान उनकी पोस्टिंग बनारस में हो गई। शिव भी पढ़ाई छोड़कर उनके पास बनारस चले गए थे।
 

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शहीद शिव सिंह छेत्री के पिता गोपाल छेत्री। - फोटो : अमर उजाला।

1999 में शहीद हुए थे दीपू
शिव सिंह छेत्री को घरवाले दीपू बुलाते थे। पिता गोपाल सिंह बताते हैं कि आखिरी बार आशीर्वाद लेकर ड्यूटी पर जाते बेटे का चेहरा उन्हें आज भी याद है। शिव सिंह छेत्री को 14 अगस्त 1999 को कुपवाड़ा सेक्टर में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान गोली लगी थी। 22 अगस्त को सेना के हॉस्पिटल में उनकी मौत हुई। शहादत के वक्त वह महज 23 साल के थे।

 

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शहीद शिव सिंह छेत्री। - फोटो : अमर उजाला।

शहीद के अंतिम दर्शन को उमड़े थे शहरवासी
शहीद शिव सिंह छेत्री के अंतिम दर्शन को पूरा गोरखपुर उमड़ पड़ा था। बाद में उनके नाम पर बिछिया में मुख्य मार्ग बनाया गया। एक जुलाई 2001 को उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह प्रतिमा आज भी शहर के नौजवानों को देश के लिए मर-मिटने की प्रेरणा देती है।

 

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शहीद गौतम गुरुंग। (फाइल) - फोटो : अमर उजाला।
रॉकेट लांचर के हमले में शहीद हुए गौतम गुरुंग
कारगिल की जंग में पांच अगस्त 1999 को बंकर में फंसे आठ साथियों को बचाने के दौरान रॉकेट लांचर से घायल हुए गौतम गुरुंग भी शहीद हो गए थे। भारत नेपाल मैत्री समाज के अध्यक्ष अनिल कुमार गुप्ता ने बताया कि शहीद के ब्रिगेडियर पिता ने देहरादून में बेटे के नाम पर शहीद गौतम गुरुंग ट्रस्ट की स्थापना की है। उनके नाम पर वहां बॉक्सिंग क्लब भी चल रहा। यहां से प्रशिक्षित कई युवा सरकारी नौकरी में हैं। उन्होंने बताया कि गौतम की चार पीढ़ियों ने लगातार देश की सेवा की है। गौतम जीआरडी के पूर्व कमांडेंट पीएस गुरुंग और पुष्पलता के एकलौते बेटे थे। देहरादून में 23 अगस्त 1973 को जन्मे गौतम एमबीए के बाद सेना में भर्ती हुए।
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