इस मंदिर में ब्रिटिश अफसर भी टेकते थे मत्था, हैरान करने वाला है इसका इतिहास, तस्वीरें
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बताया कि ओडिशा से आने वाले रामानुज दास ने वर्ष 1786 में मंदिर को स्थापित कराया। उस समय यह क्षेत्र पड़ोसी राष्ट्र नेपाल के अधीन होने के साथ दुर्गम और काफी भयावह था। स्वप्न में भगवान के दर्शन के बाद इसे पवित्र स्थल मानकर जब रामानुज दास यहां तपस्या में लीन हो गए तो इसकी जानकारी निचलौल के राजा महादत्त सेन को हुई। राजा ने स्वयं आकर रामानुज का दर्शन किए।
मंदिर में चंदन यात्रा, स्वान यात्रा, रथ यात्रा, झूलनोत्सव, विजयादशमी, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, श्री राम जन्मोत्सव, वामन जयंती आदि उत्सव मनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ की भव्य प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में मखमली रेशमी वस्त्रों, आभूषणों, चांदी की रत्नजड़ित सिंहासन पर रखा गया है। पूजा-अर्चना व आरती के बाद प्रत्येक दिन मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। प्रत्येक दिन मठाधीश व पुजारियों द्वारा रात्रि 8 बजे शंखनाद, घंटे व नगाड़े के बीच महाआरती की जाती है। जिसमें समूचा गांव भगवान जगन्नाथ की भक्ति में लीन हो जाता है। पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ की नीलाद्रि पद्धति से विशेष पूजा व आरती होती है।
आसपास के जिलो से आते हैं श्रद्धालु
सावन माह में झूलोत्सव का आयोजन होता है। पांच दिन तक मंदिर परिसर में मेला चलता है। इस बीच जिले से ही नहीं गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, सिद्धार्थनगर, वाराणसी आदि जिलों से श्रद्धालु मेला देखने के लिए आते हैं। पांच दिनों तक रात्रि में प्रवचन व रेडियो, दूरदर्शन कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं। करीब 100 वर्ष रहने घुघली क्षेत्र के भरवलिया निवासी भुलाई मिश्र ने यहां आकर भगवान जगन्नाथ की पूजा अर्चना की। इसके बाद उनके घर पुत्र पैदा हुआ। उन्होंने मंदिर में ही एक कमरे का निर्माण करवाया था।