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Apna Adda 10: बनारस के रस से बनी मुंबई रास आ गई, बहुत प्यासा था समंदर नदी पास आ गई...

Wed, 10 Apr 2024 07:44 PM IST
आकांक्षा गुप्ता अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई Published by: आकांक्षा गुप्ता Updated Wed, 10 Apr 2024 07:44 PM IST
सार

5 नवंबर 2020 को जब पहली बार अकेले मुंबई के सफर पर मैं निकली तो मेरी उम्र 42 साल थी। यहां ज्यादा किसी को जानती नहीं थी और मुझे लगा था कि ये मेरी पहली और आखिरी यात्रा होगी। मेरे दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके थे तो जिनसे भी मिलती उन्हें ये पुस्तकें भेंट करती।

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interesting journey lyricist Ankita Khattry Naadan of Varanasi uttar pradesh t series yash raj Sanjay masoom
अंकिता खत्री - फोटो : अमर उजाला

कुछ साल पहले तक शादी-विवाह और उसके बाद बच्चों की परवरिश में खुद को तपा देने वाली करोड़ों महिलाओं में शामिल रहीं वाराणसी की अंकिता खत्री ‘नादान’ अब हिंदी सिनेमा में एक गीतकार और कथा लेखक के रूप में तेजी से उभरता नाम हैं। उनके लिखे भजनों को टी सीरीज जैसी म्यूजिक कंपनी ने हाथोंहाथ लिया है। उनकी लिखी कहानी पर वेब सीरीज बनने की तैयारियां हैं और ये सब अंकिता ने हासिल किया है मुंबई आने के सिर्फ चार साल के भीतर। अंकिता ने गीतकार के रूप में अपने जीवन की दूसरी पारी शुरू की है और उन तमाम महिलाओं के लिए एक प्रेरणा की तरह हैं जिन्हें लगता है शादी और बच्चे होने के बाद जीवन में कुछ नया करने कराने का समय गुजर चुका है। अंकिता से ‘अपना अड्डा’सीरीज के तहत एक खास बातचीत।

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अंकिता खत्री - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म जगत में अपनी पहचान बनाने को मुंबई आना कब और क्यों हुआ?

5 नवंबर 2020 को जब पहली बार अकेले मुंबई के सफर पर मैं निकली तो मेरी उम्र 42 साल थी। यहां ज्यादा किसी को जानती नहीं थी और मुझे लगा था कि ये मेरी पहली और आखिरी यात्रा होगी। मेरे दो काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके थे तो जिनसे भी मिलती उन्हें ये पुस्तकें भेंट करती। इन्हीं दिनों ‘मांझी द सेवियर’ गीत का भी बीज पड़ा। मेरा पहला गीत 30 दिसंबर 2020 को उस यशराज फिल्म्स स्टूडियोज में रिकॉर्ड हुआ, जिसके लोगो वाली फिल्में देखते हुए मैं बड़ी हुई। यूं लग रहा था कि कोई सपना है जो मैं अब भी देख रही हूं। गाना और इसका वीडियो दोनों खूब लोकप्रिय हुए। मुझे इसके लिए पुरस्कार भी मिले और इसी गीत ने मेरे लिए टी सीरीज के दरवाजे खोले।

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अंकिता खत्री - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, यहीं से आपका खुद पर भरोसा मजबूत हुआ..?

जी हां, कह सकते हैं। मैंने एक भक्ति गीत लिखा, ‘सावन मा बाजे डमरू डम डम, नाचत भोला छम छम छम छम’। इसी गीत से मेरा पहला अनुबंध म्यूजिक कंपनी टी सीरीज से हुआ। इस गीत से मेरा हौसला इतना बढ़ा कि एक फिल्म के लिए मैंने सिर्फ 10 मिनट में तब मुखड़ा लिख दिया, जब मैं वाराणसी में एक कार्यक्रम में मंच संचालन के लिए तैयार हो रही थी।जोजो और अनुपमा चक्रवर्ती की आवाज में रिकॉर्ड हुआ ये गाना न्यू मिलेनियल्स की पसंद के मुताबिक लिखा गया है। 

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अंकिता खत्री - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मुंबई आने के बाद किस बात ने आपके लिए सबसे ज्यादा उत्प्रेरक का काम किया?

मैं स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन के दफ्तर में अपनी एक एक स्क्रिप्ट रजिस्टर्ड करवाने गई थी। वहां मुझे 1935 से लेकर अब तक के तमाम लेखकों व गीतकारों की तस्वीरें सजावट के तौर पर लगी दिखीं। लेकिन, इतने सारे लोगों में एक भी महिला की तस्वीर नहीं थी। मतलब, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में महिलाओं का फिल्मी लेखन में योगदान या तो न के बराबर रहा है या फिर उन्हें इतनी मान्यता नहीं दी गई। इस घटना ने मुझे एक गीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाने के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा दी। 

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अंकिता खत्री - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मुंबई आने से पहले आपने वाराणसी में भी काफी काम किया, उसके बारे में कुछ बताएंगी? 

मैं काशीवासी संस्कृतिकर्मी रही हूं। फाइन आर्ट्स से एमए किया और टॉपर रही। अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए 19 साल की उम्र में कला समीक्षक का काम किया। एक पत्रिका का संपादन भी किया। प्रदर्शनियां आयोजित करना मेरा बड़ा शौक था लेकिन विवाह के बाद सब बंद हो गया। लेकिन, जैसे जैसे पारिवारिक जिम्मेदारियां घटनी शुरू हुईं तो साल 2007 में मैंने कथक सीखना शुरू किया। मैं घर का काम करके, बच्चों को सुलाकर जाती थी। पूरी क्लास में सब युवतियां ही होतीं, मैं अकेली दो बच्चों की मां वहां कथक सीखने जाया करती थी। इसके बाद मैंने दूसरों को नृत्य करना सिखाया और लंबे समय तक पारिवारिक कार्यक्रमों में नृत्य निर्देशन का काम किया।

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