निर्देशक सुदीप्तो सेन को पूरी दुनिया में फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ से जो शोहरत मिली है, वह किसी भी निर्देशक के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकती है। वह दिन रात नए कलाकारों और नए तकनीशियनों की खोज में रहते हैं। मुद्दा आधारित फिल्में बनाने वाले निर्देशकों को भी अपना मंच प्रदान करने में नहीं हिचकते। वह मानते हैं कि बाहर से आकर हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाना आसान नहीं है। मुश्किल वह ये भी स्वीकार करते हैं कि नए विचारों को और नए लोगों को हिंदी सिनेमा आसानी से स्वीकार नहीं करता है। खाना वह बेहतरीन बनाते हैं और अपनी पाक कला की काबिलियत पर किसी दिन विस्तार से बात करने का वह वादा भी करते हैं। सुदीप्तो सेन से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक एक्सक्लूसिव बातचीत।
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निर्देशक सुदीप्तो सेन
- फोटो : अमर उजाला
फिल्म ‘चरक’ को लेकर विदेश में कैसी प्रतिक्रिया मिली आपको?
फिल्म ‘चरक’ देश के लोक अंचलों में प्रचलित लोक परंपराओं के बारे में बनी एक फिल्म है। चरक पूजा का संदर्भ कई राज्यों के लोक प्रतीकों में मिलता है। इस फिल्म का केंद्र बिंदु यही है और मुझे ये देखकर प्रसन्नता हुई कि बर्लिन में इस फिल्म को लोगों ने हाथों हाथ लिया। इस फिल्म को अपने अपने देशों में रिलीज करने के कई प्रस्ताव भी मेरे पास लगातार विदेशी फिल्म वितरण कंपनियों के आ रहे हैं।
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निर्देशक सुदीप्तो सेन निर्देशित फिल्म '‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आमतौर पर एक फिल्म हिट होने के बाद लोग एक साथ कई फिल्में साइन कर लेते हैं, लेकिन आपने ‘द केरल स्टोरी’ के बाद ‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’ बनाई और अब एक नए निर्देशक के साथ फिल्म बना रहे हैं?
सिनेमा मेरे लिए आत्मसंतुष्टि का साधन रहा है। ‘द केरल स्टोरी’ के पहले भी मेरी कई फिल्में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में शामिल होती रही हैं। मेरी साधना सिनेमा की है, धन की नहीं है। किसी भी कला क्षेत्र में संतुष्टि तभी मिलती है, जब जो आप रचना चाहते हैं, उसे पा लेते हैं। सिनेमा फिल्म दर फिल्म बेहतरी का माध्यम है। नए कलाकारों और तकनीशियनों को मौका देने में भी अलग ही सुकून है।
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निर्देशक सुदीप्तो सेन निर्देशित फिल्म 'द केरल स्टोरी’
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सवाल मेरा ये था कि फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ के बाद आपके पास जो आधा दर्जन फिल्में बनाने के प्रस्ताव हिंदी सिनेमा की दिग्गज फिल्म निर्माण कंपनियों के आए थे, उन्हें आपने क्यों नहीं स्वीकार किया?
मैं रचनात्मक स्वतंत्रता का समर्थन करने वाला निर्देशक हूं। मेरी कोशिश रही है कि मैं उन्हीं निर्माताओं के साथ काम करूं जो मेरी रचनात्मक स्वतंत्रता को स्वीकार करें। ऐसे निर्माताओं के साथ काम करने में मुझे घुटन होती है, जो एक बार सारी बातें तय हो जाने के बाद भी सीन दर सीन सुझाव देते रहते हैं। सुझाव देने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन उसे लागू करने या न करने का निर्णय निर्देशक पर छोड़ देना चाहिए।
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'द केरल स्टोरी' का रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ को साल 2023 में दर्शकों ने खूब प्यार दिया, मुंबई के तथाकथित फिल्म पुरस्कारों ने उसे उतनी ही उपेक्षा दी, इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
ये तो आपने भी देखा कि फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ एक सच को उजागर करने वाली फिल्म रही है। ये एजेंडा फिल्म कतई नहीं है। आपके रिव्यू की हेडिंग मुझे अब तक याद आती है, ‘एजेंडा नहीं, सच को उजागर करती फिल्म’। अब जो लोग एजेंडे के साथ फिल्म देखने आते हैं, उन्हें क्या ही कह सकता हूं मैं? मेरी कोशिश सच का साथ देने की रही है। मुंबई मायानगरी है। और, माया का पूरा आडंबर ही छद्म आवरणों का है। फिल्म ने अपने निवेश पर एक हजार फीसदी मुनाफा कमाया, दर्शकों का ये प्यार ही मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार है।