फिल्म छपाक में आपने तेजाब हमले की पीड़ित लक्ष्मी अग्रवाल की जिंदगी को ज्यों का त्यों परोसा है या इसमें कुछ सिनेमाई बदलाव भी किए हैं?
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आपकी फिल्म से एक हफ्ते पहले इसी मुद्दे पर बनी फिल्म 'एसिड' रिलीज होने वाली है। क्या यह आपकी फिल्म छपाक पर कोई असर दाल सकती है?
फिल्म 'तलवार' से पहले उसी मुद्दे पर फिल्म 'रहस्य' रिलीज हुई थी। मुझे नहीं लगता कि उस फिल्म ने तलवार पर कोई असर डाला। उम्मीद यही है कि दोनों फिल्में अपनी-अपनी जगह अपने-अपने दर्शक ढूंढ लें।
'कॉलिंग सहमत' के लेखक हरिंदर सिक्का ने कहा है कि फिल्म 'राजी' अगर उनकी किताब के अनुसार ही बनाई जाती तो वह राष्ट्रीय पुरस्कार जीत लेती। आपकी प्रतिक्रिया?
सबको अपने निजी विचार व्यक्त करने का पूरा हक है। जब राजी ने 100 करोड़ रुपये कमाए थे तब इन्हीं हरिंदर सिक्का ने फिल्म को बहुत सराहा था। राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा सितंबर में हुई है तो दिसंबर में इस बात को छेड़ने का क्या मतलब है? ये मेरी समझ में नहीं आया। लेखक अपनी कल्पनाओं से किताब लिखते हैं और फिल्मकार अपनी कल्पना से फिल्म बनाते हैं। सिर्फ तिरंगा दिखाने से फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाता, तो हर फिल्म में तिरंगा होता।
क्या आपको कभी ऐसा लगा कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार किसी ऐसी फिल्म को मिला जो उसके लायक नहीं थी?
किसी को कोई फिल्म अच्छी लगी तो उसकी मंशा होती है कि उसको सराहा जाए, उसे सम्मान मिले। लेकिन पुरस्कार किसी और फिल्म को मिल जाता है। इसमें आप कोई समीकरण नहीं बना सकते। राष्ट्रीय पुरस्कार कोई वजन करने का जरिया नहीं है। वह एक सम्मान है। जिसको मिला वह बहुत अच्छा हुआ और जिसको नहीं मिला वह अगले साल फिर से कोशिश करे।
आपके करियर में एक अखबार की क्या भूमिका रही है?
मैं हमेशा से अखबार पढ़ती आई हूं और अभी भी वैसे ही पढ़ती हूं जैसे पहले पढ़ती थी। मुझे दिन की खबरें पन्ने से पढ़ना ज्यादा पसंद है। मैं अभी इतनी डिजिटल नहीं हुई हूं कि मोबाइल पर खबरें पढूं। जिनको खबरों से जुड़े रहना है, वह आज भी अखबार पढ़ते हैं।