सिनेमा और समाज शुरू से एक ही सिक्के के दो पहलू रहे हैं। जैसा समाज होता है, सिनेमा भी वैसा ही बनता है। ये अलग बात है कि छोटे बजट की फिल्मों को रिलीज कर पाना भारत में बहुत मुश्किल है क्योंकि फिल्मों की रिलीज देश में एक ऐसा गणित है, जिसे सीखने में 'शकुंतला देवी' भी फेल हो चुकी है और ऐसी ही कुछ कहानी रही है सीधे ओटीटी पर रिलीज हुई फिल्म 'जेएल 50' की। इस फिल्म के आधा दर्जन निर्माताओं में से एक रितिका आनंद इस फिल्म की नायिका भी हैं।
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रितिका आनंद
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म की निर्माता और इसमें पायलट की भूमिका निभा रही रितिका बताती हैं, 'ये एक बहुत लम्बी कहानी है. इसकी शुरुआत तब हुई थी जब मैं बड़े पर्दे पर अपने एक्टिंग के सपनों को साकार करने 17 साल पहले मुम्बई आई थी। मैंने 5 साल की छोटी सी उम्र में ही ठान लिया था कि मुझे आगे चलकर एक्टिंग करना है। बचपन में खेलने के नाम पर मैं एक्टिंग ही किया करती थी। 14 साल की उम्र में मैं एक्टिंग को लेकर बेहद संजीदा हो गयी थी, तब मैंने ख़ुद को रंगमंच और नाटकों से जोड़ लिया था। उस दौरान मैं एक प्रशिक्षित भरत नाट्यम डांसर भी थी और मैंने इस विधा में 8 साल की ट्रेनिंग हासिल कर रखी थी। मैंने नृत्य में प्रशिक्षण इसलिए हासिल किया था क्योंकि मेरे दादाजी मुझे पुराने ज़माने की हीरोइन्स के ऐसे किस्से सुनाया करते थे जहां वो बताया करते थे कि कैसे वे हीरोइनें फ़िल्मों में काम करने के लिए पहले से ही गायिकी और नृत्य कला में बेहद निपुण हुआ करती थीं।'
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रितिका आनंद
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिर सिनेमा से पहला साक्षात्कार कैसा रहा? ये एक ऐसा सवाल है जो रितिका को आज भी चुभता है। वह कहती हैं, 'कनाडा के काल्गरी विश्वविद्यालय में अभिनय में डिप्लोमा हासिल करने के बाद मेरा आत्मविश्वास आसमान छू रहा था और मुझे लगा कि एक प्रशिक्षित एक्टर होना इंडस्ट्री में एक्टर बनने के लिए काफ़ी है। उसके बाद मैंने टीवी के लिए काम किया, 500 से ज्यादा बार ऑडिशन दिया और कुछ फ़िल्में भी साइन कीं। मगर वे फ़िल्में कभी बनी ही नहीं। फिर मैंने ऑडिशन्स में जाना बंद कर दिया था, मुझे लगता था कि ऐसा करना मेरी कला और एक्टिंग में हासिल मेरी शिक्षा के प्रति एक किस्म का अनादर है। मैंने निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने का फ़ैसला किया क्योंकि मेरे परिवार को लगता था कि मैं इसके लिए पूरी तरह से सक्षम हूं।'
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रितिका आनंद
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हिंदी सिनेमा में हीरोइन बनने आई बाहरी लड़कियों के साथ होने वाले बर्ताव और एक निर्माता बनने के बाद एकदम से बदलने वाले व्यवहार के बारे में पूछे जाने पर रितिका कहती हैं, ‘मैं 2009 में एक डाक्यूमेंट्री बनाने की तैयारी कर रही थी। उस वक्त मैं अन्य लोगों के साथ लोकेशन की तलाश में निकली। डायरेक्टर को लोकेशन पसंद नहीं आई और उन्होंने इस लोकेशन के लिए साफ़ मना कर दिया। मैं अपनी कार में बैठकर तब रोने लगी थी। उस वक्त मुझे लगा कि मैं कोई भी फ़िल्म प्रोड्यूस करने के क़ाबिल नहीं हूं। फिर जेएल 50 के निर्देशक शैलेंद्र व्यास मिले। उन्होंने मुझे अपने तौर तरीके बदलने को कहा। मैंने भी इसके बाद टिपिकल फिल्म निर्माता की तरह काम करना शुरू कर दिया। ये मेरे लिए था तो थोड़ा अजीब लेकिन काम कर गया।’
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जेएल 50
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘इंटरस्टेलर’ जैसे विषय पर बनी इस फिल्म में पंकज कपूर ने शानदार काम किया है, कैसा रहा उनके साथ काम करने का अनुभव? ‘फिल्म जेएल 50 का ‘इंटरस्टेलर’ या किसी दूसरी फिल्म से कोई लेना देना नहीं है। हमने इस स्क्रिप्ट को सबसे पहले पंकज कपूर को सुनाया। उन्हें स्क्रिप्ट बेहद पसंद आई और उन्होंने इसमें काम करने के लिए फौरन हामी भर दी। फिर मैंने इसे अभय के पास भेजा और फिर उन्होंने ने भी इसमें काम करने की इच्छा जताई। मुझे अपना किरदार भी बेहद पसंद आया जिसे निभाकर मैं बेहद ख़ुश थी।‘ फिल्म की इतनी आसानी से हो गई कास्टिंग का जिक्र करते समय रितिका का चेहरा चमक जाता है।