बांसुरी के जादूगर हरिप्रसाद चौरसिया का आज 1 जुलाई को जन्मदिन है। विश्व प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के जन्मदिन पर जानिए उनसे जुड़े दिलचस्प किस्से।
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हरिप्रसाद चौरसिया
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हरिप्रसाद चौरसिया का जन्म
हरिप्रसाद चौरसिया का जन्म 1 जुलाई 1938 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुआ। पंडित जी ने अपनी बांसुरी की मधुर धुनों से पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध किया है। उनके पिता चाहते थे कि वह पहलवान बनें, लेकिन हरिप्रसाद जी का मन संगीत में रमा। परिवार की इच्छा के खिलाफ जाकर उन्होंने महज 13 साल की उम्र में एक अनजान लड़के से बांसुरी मांगकर पहली बार धुन बजाई, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
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हरिप्रसाद चौरसिया
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संगीत की शिक्षा
राजाराम और बनारस के मशहूर बांसुरी वादक भोलानाथ प्रसन्ना ने उन्होंने संगीत सीखाया। पंडित जी ने न केवल शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि 'शिव-हरि' जोड़ी के साथ हिंदी फिल्मों जैसे 'चांदनी', 'लम्हे' और 'सिलसिला' में भी मधुर संगीत दिया। उनकी बांसुरी की धुन आज भी लोगों के दिलों को छूती है। उन्हें पद्म भूषण (1992), पद्म विभूषण (2000), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों से सम्मान मिले हैं। 87 साल की उम्र में भी पंडित हरिप्रसाद चौरसिया अपनी कला से दुनिया को जोड़ रहे हैं।
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बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया
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हरिप्रसाद चौरसिया का बचपन
हरिप्रसाद चौरसिया का बचपन गंगा किनारे बनारस में बीता। पांच साल की उम्र में उनकी मां का देहांत हो गया, जिसके बाद उन्होंने मुश्किलों का सामना किया। उनकी सादगी और भारतीय व्यंजनों, खासकर पान और जलेबी का शौक, उन्हें लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाता है।
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बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया
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बांसुरी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बांसुरी को नया मुकाम दिया। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) में काम किया और 1968 में बीटल्स के साथ "द इनर लाइट" जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया। उनके प्रमुख एल्बमों में 'पं. हरिप्रसाद चौरसिया - फ्लूट', 'मॉर्निंग टू मिडनाइट राग' और 'अजन्मा' शामिल हैं।