शूटिंग के पहले दिन क्यों फूट फूट कर रोई थीं सहर बाम्बा, करण देओल की हीरोइन ने खोले कई राज
फिल्म कैसे मिली, बताएंगी कुछ हमारे पाठकों को?
मैं मुंबई एक्टर बनने ही आई हूं। लेकिन पहले पढ़ाई पूरी करने के लिए यहां कॉलेज में एडमीशन लिया। चर्चगेट से लोकल ट्रेन में सफर करती। अंधेरी के आरामनगर इलाके में आकर रोज ऑडीशन देती। यही चल रहा था कि एक दिन फिल्म के लिए ऑडीशन के लिए फोन आया। सुबह पांच बजे उठकर इस फिल्म का ऑडीशन देने आई थी। फर्स्ट लुक ओके होने के बाद महीने भर तक तमाम तरह के दूसरे ऑडीशन इस रोल के लिए चले तब जाकर कहीं मुझे ये फिल्म मिली।
फिल्म पल पल दिल के पास में मेरा किरदार एक फूड ब्लॉगर का है। कैंपिंग के दौरान उसकी मुलाकात कैंपिंग का कारोबार करने वाले एक लड़के से होती है और मेरा किरदार उसके कारोबार की हकीकत का पर्दाफाश करने की ठानता है। लेकिन, इस सफर में ही उसे असली दुनिया के बारे में पता चलता है और उसकी शख्सीयत पूरी तरह बदल जाती है।
बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के आप फिल्मों में आ गईं, किसने सबसे ज्यादा प्रोत्साहित किया इस करियर के लिए?
मैं बचपन से ही नाचती गाती रही हूं। घरवालों को लग गया था कि ये लड़की एक्टर ही बनेगी। मुझे पूरे परिवार ने इस काम के लिए समर्थन दिया लेकिन सबसे ज्यादा प्रोत्साहित मुझे मेरी मां ने किया है। उनके समर्थन के बिना शायद मैं यहां तक पहुंच नहीं पाती।
फिल्म में अपने उस पहले सीन के बारे में बताइए जिसे निर्देशक सनी देओल ने ओके किया?
हां, ये सीन मुझे हमेशा याद रहेगा। उस सीन में मुझे खूब भागना था और बुरी तरह हांफना था। मैं भाग तो खूब रही थी लेकिन हांफने के जैसे भाव चेहरे पर आने चाहिए थे वे नहीं आ पा रहे थे। सुबह से काम करते करते लंच ब्रेक हो गया पर शॉट ओके नहीं हुआ। मैं अलग जाकर रोने लगी और मां को फोन करके कहा कि शायद मैं यह सब नहीं कर पाऊंगी। लेकिन, सनी सर ने ये शॉट एक बार और लिया और वो ओके हो गया। इसके बाद ही मैंने पहली बार खुद को मॉनीटर पर देखा।