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आंखों में रोशनी के बिना संगीत से फैला दिया उजाला, पढ़िए रवींद्र जैन के बेहतरीन गीतों के किस्से...
Wed, 27 Feb 2019 03:00 PM IST
विजय जैन
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
Published by: विजय जैन
Updated Wed, 27 Feb 2019 03:00 PM IST
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रवींद्र जैन
- फोटो : file photo
उनकी आंखो में रोशनी नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपने संगीत से देश को रोशन कर दिया था। हम बात कर रहे हैं उस महान संगीतकार-लेखक रवींद्र जैन की, जिनकी कमी बॉलीवुड में कभी पूरी नहीं हो पाएगी। 28 फरवरी 1944 में यूपी के अलीगढ़ जिले में जन्मे रवींद्र जैन 7 भाई-बहनों में तीसरे नंबर के थे। 1972 में उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की।
हर हसीं चीज का मैं तलबगार हूं
राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'सौदागर' से उन्होंने खुद को मुकद्दर का सिकंदर साबित कर दिखाया। 1973 में आई 'सौदागर' फिल्म का गीत 'हर हसीं चीज का मैं तलबगार हूं' से फिल्म जगत में अपने पैर जमा लिए थे। रवींद्र जैन ने हिंदी सिनेमा जगत में दर्जनों रस से भरे गीत दिए हैं।
राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'सौदागर' से उन्होंने खुद को मुकद्दर का सिकंदर साबित कर दिखाया। 1973 में आई 'सौदागर' फिल्म का गीत 'हर हसीं चीज का मैं तलबगार हूं' से फिल्म जगत में अपने पैर जमा लिए थे। रवींद्र जैन ने हिंदी सिनेमा जगत में दर्जनों रस से भरे गीत दिए हैं।
गीत गाता चल, ओ साथी गुनगुनाता चल
साल 1975 में आई फिल्म 'गीत गाता चल' का 'गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल' से रवींद्र जैन ने सबका दिल जीत लिया था। इस गीत के गीतकार-संगीतकार रवींद्र जैन थे गायक जसपाल सिंह थे। राजश्री प्रोडक्शन के बैनतर तले बनी इस फिल्म का संगीत सराहा गया था।
साल 1975 में आई फिल्म 'गीत गाता चल' का 'गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल' से रवींद्र जैन ने सबका दिल जीत लिया था। इस गीत के गीतकार-संगीतकार रवींद्र जैन थे गायक जसपाल सिंह थे। राजश्री प्रोडक्शन के बैनतर तले बनी इस फिल्म का संगीत सराहा गया था।
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मंगल भवन अमंगल हारी
बचपन में ही जैन भजन और जैन कवियों की कविताएं पढ़नी और गानी शुरू कर दी थीं। उन्होंने दादा-दादी की कहानियां, रामायण और लव-कुश जैसे मशहुर कार्यक्रमों को जैन ने अपने संगीत से सजाया। 'चोर मचाए शोर', 'अंखियों के झरोखे से', 'राम तेरी गंगा मैली', 'हिना' जैसी अनेक फिल्मों के अलावा दूरदर्शन के रामायण सीरियल को गीत-संगीत से सजा दिया। रवींद्र जैन की ऊंचे सुर की आवाज में 'मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी' गीत आज भी लोकप्रिय है।
बचपन में ही जैन भजन और जैन कवियों की कविताएं पढ़नी और गानी शुरू कर दी थीं। उन्होंने दादा-दादी की कहानियां, रामायण और लव-कुश जैसे मशहुर कार्यक्रमों को जैन ने अपने संगीत से सजाया। 'चोर मचाए शोर', 'अंखियों के झरोखे से', 'राम तेरी गंगा मैली', 'हिना' जैसी अनेक फिल्मों के अलावा दूरदर्शन के रामायण सीरियल को गीत-संगीत से सजा दिया। रवींद्र जैन की ऊंचे सुर की आवाज में 'मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी' गीत आज भी लोकप्रिय है।
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जब दीप जले आना
साल 2015 में रवींद्र जैन को पद्मश्री अवॉर्ड से भी नवाजा गया। 1976 में आई फिल्म 'चितचोर' के गीत 'जब दीप जले आना' को संगीत से ऐसा सजाया कि ये गीत संगीत के छात्रों के लिए एक विषय जैसा बन गया। रवींद्र जैन ने बचपन में संगीत की बारीकियां पंडित घंमडी लाल, पंडित जनार्दन शर्मा और पंडित नाथूराम शर्मा से सीखी थीं और बाकायदा प्रयाग संगीत समिति से शास्त्रीय संगीत की दीक्षा ली थी।
साल 2015 में रवींद्र जैन को पद्मश्री अवॉर्ड से भी नवाजा गया। 1976 में आई फिल्म 'चितचोर' के गीत 'जब दीप जले आना' को संगीत से ऐसा सजाया कि ये गीत संगीत के छात्रों के लिए एक विषय जैसा बन गया। रवींद्र जैन ने बचपन में संगीत की बारीकियां पंडित घंमडी लाल, पंडित जनार्दन शर्मा और पंडित नाथूराम शर्मा से सीखी थीं और बाकायदा प्रयाग संगीत समिति से शास्त्रीय संगीत की दीक्षा ली थी।