रंगमंच से रुपहले पर्दे पर पहुंचे अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने गैंग्स ऑफ वासेपुर, निल बटे सन्नाटा, दबंग, अनारकली ऑफ आरा जैसी कई फिल्में की हैं। विभिन्न किरदारों में जीवंत अभिनय के लिए उन्हें काफी सराहना मिली है। अब उनकी फिल्म 'न्यूटन' को अगले साल ऑस्कर पुरस्कारों की विदेशी फिल्मों की श्रेणी में भारत की ओर से आधिकारिक एंट्री मिली है। फिल्म नक्सलवाद की पृष्ठभूमि पर बनी है जो इस देश का एक संवेदनशील मुद्दा है।
फिल्म में सैन्य अधिकारी का किरदार
फिल्म में सैन्य अधिकारी का किरदार निभाने वाले पंकज त्रिपाठी के इस फिल्म के साथ के अनुभव पर बीबीसी ने विस्तृत बातचीत की। पंकज त्रिपाठी से पूछा गया कि फिल्म करने से पहले क्या ये नहीं सोचा था कि इस पर विवाद की संभावना भी बन सकती है तो उन्होंने कहा, "फिल्म में कुछ विवादित नहीं है। यह किसी का पक्ष नहीं लेती। बिना किसी का पक्ष लिए बहुत संतुलित तरीके से दोनों पक्षों की बातें की गई है। सरकार बुरी है या नक्सली अच्छे हैं, यह फिल्म ऐसी कोई बात नहीं कर रही। यह केवल दोनों का पक्ष रख रही है।"
सरकार और नक्सली दोनों का पक्ष रखती है फिल्म
यह फिल्म मुख्यधारा से हटकर है। इसे करने की वजह पर पंकज कहते हैं कि हम थियेटर से आए हैं और हम फिल्म के चयन के पीछे स्टोरी में तर्क हैं। कमर्शियल सिनेमा मनोरंजन पर केंद्रित होता है जबकि इस तरह की फिल्मों मं कुछ गहराई होती है। सिनेमा का काम सिर्फ मनोरंजन नहीं है ऐसी कहानियों में मौलिकता होती हैं।
चुनाव प्रक्रिया को बहुत करीब से देखा
बिहार के गोपालगंज के बेलसंड के रहने वाले पंकज त्रिपाठी के पिता पंडित बनारस तिवारी किसान हैं। 10वीं की पढ़ाई के बाद वो पटना आए। फिल्मों से परिवार का कोई नाता नहीं था। रंगमंच से एनएसडी पहुंचे और फिर फिल्मों में। उन्होंने बताया कि न्यूटन फिल्म के विषय चुनाव प्रक्रिया को उन्होंने अपनी वास्तविक जिंदगी में करीब से देखा है।
जंगल में की गई शूटिंग
न्यूटन की शूटिंग छत्तीसगढ़ के जंगलों में की गई है। जंगल में मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। न्यूटन फिल्म में वैनिटी वैन की जगह जंगल में खटिया थी। पंकज त्रिपाठी ने बताया, "पेड़ों के नीचे बैठ कर शूटिंग किया गया। कमर्शल फिल्मों में वैनिटी वैन, एसी, फ्रिज सभी होते हैं। दोनों फिल्मों का अपना अलग-अलग सुख है।