हिंदी सिनेमा के दिग्गज निर्माता-निर्देशक रवि टंडन के पिता चाहते थे कि वह पढ़ाई करके डॉक्टर बनें फिल्मों के शौक के चलते वह एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी किए बिना ही मुंबई आ गए। रवि टंडन ने मुंबई में बहुत कड़ा संघर्ष किया। सिनेमा से जुड़ा हर छोटा-बड़ा काम किया। बस हिम्मत नहीं हारी। अपनी मेहनत, ईमानदारी, विनम्रता, धैर्य और आत्मबल के बल पर वह हिंदी सिनेमा के कामयाब निर्माता-निर्देशक बने। 17 फरवरी 1935 को आगरा में जन्मे रवि टंडन का आज जन्मदिन हैं। उनकी बेटी रवीना टंडन से समझने की कोशिश करते हैं हिंदी सिनेमा में रवि की रोशनी का तिलिस्म...
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7 फरवरी 1935 को आगरा में जन्मे रवि टंडन का आज जन्मदिन हैं। उनकी बेटी रवीना टंडन से समझने की कोशिश करते हैं हिंदी सिनेमा में रवि की रोशनी का तिलिस्म...
पापा का सपना पूरा कर दिया
अभिनेत्री रवीना टंडन को बीते साल पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। रवीना टंडन के लिए वह बहुत ही भावुक क्षण था। रवीना टंडन के मुताबिक, 'मेरे लिए यह सम्मान बहुत ही भावुक क्षण था। हमेशा से मेरे पिता का सपना था कि मुझे पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाए। मगर अफसोस यह देखने के लिए वह आज यहां नहीं हैं।'
जीवन में मिली यह सीख
रवीना टंडन के पिता रवि टंडन हिंदी सिनेमा के जाने माने निर्माता - निर्देशक रहे हैं, लेकिन रवीना टंडन ने यह कभी नहीं सोचा कि उनके पिता उन्हें फिल्मों में लांच करेंगे। रवीना टंडन कहती हैं, 'पापा ने हमेशा मुझे आत्मनिर्भर रहना सिखाया। वह आगरा से बिना कुछ लिए आए और अपने दम पर मुंबई सब कुछ बनाया। मैंने भी सोचा कि अपने दम पर फिल्में हासिल करना है। पापा से हमेशा अपने पैरों पर खुद खड़े होने की प्रेरणा मिली।'
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पिता पर गर्व है
हाल में एक इंटरव्यू के दौरान रवीना टंडन ने अपने पिता रवि टंडन के करियर को लेकर बात की। रवीना टंडन ने कहा, 'जिस तरह से मेरे पिता ने अपने करियर को संभाला, उस पर मुझे बहुत गर्व है। वह एक बहुमुखी निर्देशक के रूप में जाने जाते थे। वह 'खेल खेल में' जैसी फिल्में कर सकते थे तो 'जवाब' और 'मजबूर' जैसी मनोवैज्ञानिक थ्रिलर फिल्में भी कर सकते थे। उन्हें एक सज्जन निर्देशक के रूप में जाना जाता था।'
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जिंदगी की सबसे बड़ी सीख दी
रवीना टंडन कहती हैं, 'चाहे मेरी निजी जिंदगी में या करिअर का सबसे बुरा दौर चल रहा हो। मैंने पापा से सीखा है कि ईमानदारी, विनम्रता, धैर्य और आत्मबल से बड़ी से बड़ी परेशानी का मुकाबला किया जा सकता है। मुझे याद है एक बार पापा मेरी फिल्म के सेट पर आए और एक बात कही। उन्होंने कहा कि एक बच्चा जब चलना सीखता है तो बहुत बार गिरता है, लेकिन वह पसर कर बैठ नगीं जाता बल्कि वह उठता है, अपने आप को समेटता है और छोटे-छोटे कदम तब तक लेता है जब वह ठीक से चलना नहीं सीख लेता। जिंदगी में वैसे ही हमें अपने आप को समेट कर चलना सीखना होगा।’
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