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2019: भारत में कितने लोगों को सुनाई गई सजा-ए-मौत, दूसरे स्थान पर रहा उत्तर प्रदेश

Tue, 21 Jan 2020 10:59 AM IST
Mohit Mudgal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Mohit Mudgal Updated Tue, 21 Jan 2020 10:59 AM IST
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death sentence data capital punishment 2019 data national law university, project 39A statistics

पूरा देश निर्भया के दोषियों के फांसी पर चढ़ने का इंतजार कर रहा है। बचने के लिए दोषियों ने कई बार याचिकाएं लगाईं, लेकिन अदालत हो या राष्ट्रपति, हर बार उनकी याचिका खारिज की गई। अदालत द्वारा दूसरी बार जारी किए गए डेथ वारंट के अनुसार, चारों दोषियों को 01 फरवरी 2020 की सुबह फांसी दी जाएगी। इसके लिए जेल प्रशासन ने भी तैयारियां शुरू कर दी हैं। हाल ही में जेल प्रशासन ने डमी बनाकर फांसी देने का ट्रायल भी किया था। 



इसी बीच नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू), दिल्ली ने एक प्रोजेक्ट के तहत भारत में सजा-ए-मौत यानी फांसी की सजा को लेकर कुछ आंकड़े जारी किए हैं। जिसमें कई खुलासे किए गए हैं। इनके बारे में आगे पढ़ें।

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  • साल 2019 में देशभर के अलग-अलग ट्रायल कोर्ट्स ने कुल 102 मामलों में मौत की सजा सुनाई।
  • साल 2019 में मौत की सजा सुनाए जाने वाले हर 2 मामलों में से एक मामला यौन उत्पीड़न और हत्या का रहा।
  • आपको जानकर हैरानी होगी कि हर चार में से तीन यौन उत्पीड़न-हत्या के मामले, जिनमें मौत की सजा सुनाई गई है, उनमें पीड़ित बच्चे रहे हैं।  
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  • साल 2019 में निचली अदालतों ने साल 2018 के मुकाबले 60 प्रतिशत कम मामलों में मौत की सजा सुनाई। 
  • साल 2018 में 162 मामलों में न्यायालयों ने दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी। 
  • अगर प्रतिशत के अनुसार देखें, तो साल 2019 में सजा-ए-मौत के कुल 102 मामलों में से 52.98 फीसदी यौन उत्पीड़न के रहे। ये आंकड़ा पिछले चार साल में सबसे ज्यादा है।
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  • 2019 में कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के 54 मामलों में मौत की सजा सुनाई है। 
  • साल 2019 में यौन उत्पीड़न में फांसी की सजा वाले 26 मामले उच्च न्यायालयों (High Courts) में गए। जिनमें से 17 मामलों में उच्च अदालतों ने निचली अदालतों के फैसले पर ही मुहर लगाई। यानी यौन उत्पीड़न के करीब 65.38 फीसदी मामलों में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा गया। 
  • 2001 के बाद सुप्रीम कोर्ट में फांसी के सबसे ज्यादा मामलों पर सुनवाई पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के कार्यकाल में हुई। उनके कार्यकाल में फांसी के 27 मामलों में सुनवाई की गई।
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क्या है प्रोजेक्ट 39ए 

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  • ये जानकारी 'द डेथ पेनल्टी इन इंडिया: एनुअल स्टैटिस्टिक्स' के चौथे संस्करण में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली (NLU Delhi) के प्रोजेक्ट 39ए द्वारा प्रकाशित की गई है। 
  • प्रोजेक्ट 39ए आपराधिक न्याय प्रणाली पर आधारित एक शोध की पहल है। यह विशेष रूप से जेलों में कानूनी सहायता, यातना, मौत की सजा और मानसिक स्वास्थ्य के मामलों पर काम करती है। 

ये भी पढ़ें: क्या है IPC की धारा 279 और 337, जो एक लापरवाही पर दिला सकती है सजा

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