2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी को लगातार राजनीतिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। दिल्ली में हुए राजौरी गार्डन उपचुनाव और पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे कुछ ऐसा ही संकेत आम आदमी पार्टी के लिए भी कर रहे हैं।
अगर AAP ने लिया ये सबक तो लौट सकते हैं उसके 'अच्छे दिन', नहीं तो होगा और भी बुरा हाल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जबकि भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति इन दोनों ही पार्टियों से कहीं ज्यादा सुनियोजित और दूरगामी है। भले ही 2014 के आम चुनाव के ठीक 6 महीने बाद ही दिल्ली में बीजेपी को करारी शिकस्त (70 में से मात्र 3 सीटें) का सामना करना पड़ा था लेकिन पार्टी ने पीएम मोदी की छवि को बचाने और भुनाने की कोशिश लगातार जारी रखी। जबकि कांग्रेस ने हारने के बावजूद न तो अपने नेतृत्व में कोई परिवर्तन किया और ना ही रणनीति में। जबकि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता पाने के बाद सकरात्मक राजनीति के बजाय व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति शुरु कर दी, जिसमें मोदी को खासतौर से निशाना बनाया गया। बीजेपी ने विरोधियों की इसी चाल को अपना हथियार बना लिया और दिल्ली, बिहार व बंगाल के बाद अधिकतर राज्यों के चुनाव जीतकर दिखाया।
इससे बीजेपी की इस चुनावी रणनीति का पता चलता है जिसमें वो मोदी की छवि को जरा भी नुकसान होते ही तुरंत सजग हो जाते हैं और उसे फिर से स्थापित करने के लिए पूरी जी जान लगा देते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव और उसके नतीजे हैं। बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस अपने नेता राहुल गांधी की छवि को होने वाले नुकसान न तो कम कर पाई और ना ही सुधार सकी। इसी तरह केजरीवाल जो दिल्ली में एक जननेता और इमानदार राजनीतिक के तौर पर उभरे थे उनपर लगने वाले दागों से भी पार्टी उन्हें बचा नहीं पाई। इस गलती का खामियाजा आप को पंजाब से लेकर दिल्ली तक में भुगतना पड़ रहा है।
आंदोलन से निकली हुई आम आदमी पार्टी अपने गठन के बाद से अब तक के सबसे बुरे दौर में पहुंच गई है। 2013 के अपने पहले ही चुनाव में आम आदमी पार्टी को जहां 16.70% वोट मिले थे वहीं 2017 में उसके वोट का प्रतिशत घटकर 13% पहुंच गया है। अगर आम आदमी पार्टी की तुलना कांग्रेस से की जाए तो कांग्रेस को 2013 में 30% वोट मिले थे जबकि पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव(2015) में कांग्रेस को केवल 12% वोट मिले थे। इससे साफ जाहिर है कि 2015 में जहां कांग्रेस थी वहीं 2017 में आम आदमी पार्टी पहुंच गई है। जबकि अगर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की तुलना भारतीय जनता पार्टी से की जाए तो इसके मत प्रतिशत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। 2013 में भारतीय जनता पार्टी को 40.93% वोट मिले थे जबकि इसी चुनाव में आप को 16.70% और कांग्रेस को 12% वोट मिले थे।
अगले ही चुनाव(2015) में आम आदमी पार्टी ने जबरदस्त सुधार करते हुए बाकी सभी पार्टियों का दिल्ली में सूपड़ा साफ कर दिया और विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीत ली। इस चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली जबकि बीजेपी सिर्फ 3 सीटों पर ही सिमट गई। भारतीय जनता पार्टी ने 2015 में चुनावी हार से पहले भी किरण बेदी को एकदम से सीएम कैंडिडेट के तौर पर उतारकर प्रयोग किया था। और करारी हार के बाद भी उन्होंने अपना यह प्रयोगों का सिलसिला जारी रखा जिसका नतीजा है कि बीजेपी का वोट प्रतिशत 52% से भी उपर चला गया है।