बच्चों के कमरे को उसी तरह सहेजा है जैसा वो छोड़कर गए थे
दरवाजे पर दस्तक होते ही लगता है बेटा-बेटी आ गए। दरवाजा खेलते ही किसी अन्य को खड़े देखकर मन भर आता है। उपहार हादसे में 18 वर्ष पहले स्कूल जाने वाले अपने बेटे-बेटी को खोने वाली नीलम ने यह दर्द बयां किया। उन्होंने बताया कि आज भी दोनों बच्चों के कमरे को उसी तरह से सहेज रखा है जैसे वे बार्डर फिल्म देखने के लिए जाते समय छोड़ गए थे। नीलम ने कहा उन्हें बार-बार लगता है कि बच्चे यह न कहें मम्मी कमरा क्यों छेड़ा। (सभी फोटो: अनिल कुमार/अमर उजाला, नई दिल्ली)
बच्चों के कमरे को उसी तरह सहेजा है जैसा वो छोड़कर गए थे
नीलम कृष्ण मूर्ति उन अभागों में शामिल हैं जिन्होंने उपहार अग्निकांड हादसे में अपने दोनों बच्चों को गवां दिया। नीलम उन पलों को याद कर कहती हैं कि उनकी बेटी उन्नति (18) ने 12वीं कक्षा अच्छे नंबरों से पास की थी। वह कॉलेज में दाखिले के सपने संजो रही थी। वहीं, बेटा उज्जवल (13) नौवीं कक्षा में पढ़ता था।
बच्चों के कमरे को उसी तरह सहेजा है जैसा वो छोड़कर गए थे
नीलम ने बताया दोनों बच्चों ने कहा मम्मी सनी देओल की बॉर्डर फिल्म देखनी है और हमने भी बच्चों को प्यार से फिल्म देखने भेज दिया। हमें क्या पता था कि घर से गए बच्चे कभी वापस नहीं आएंगे। आग की सूचना मिली तो उपहार सिनेमा हॉल की तरफ भागे, लेकिन सब कुछ खाक हो चुका था।
बच्चों के कमरे को उसी तरह सहेजा है जैसा वो छोड़कर गए थे
आज भी जब दरवाजे पर घंटी बजती है तो लगता है बच्चे आ गए। फोन की घंटी बजती है तो लगता है कि बच्चे आने की सूचना देने वाले है। मन हर समय बच्चों में रहता है। क्या कर सकते हैं, घर सूना हो गया। जब से बच्चे गए हैं उनका हर सामान यानी स्कूल बैग, किताबें, कपड़े इत्यादि ज्यों का त्यों रखे हैं। हर रोज साफ सफाई कर जो सामान जहां था वैसे ही रख देते हैं।
बच्चों के कमरे को उसी तरह सहेजा है जैसा वो छोड़कर गए थे
अभी भी विश्वास नहीं होता कि बच्चे दूर चले गए हैं। हमने अपने बहुमूल्य 18 वर्ष न्याय पाने के लिए लगा दिए। इतना समय तो हमने अपने बच्चों के साथ नहीं गुजारा जितना अदालत में गुजार दिया। आखिर मिला भी क्या-बच्चों की मौत की कीमत। हम टूट गए हैं। अब नहीं लगता कि देश में आम लोगों के लिए न्याय है।