आज के समय में महिलाएं लड़ाकू विमान उड़ाकर देश का नाम रोशन कर रही हैं। आपको याद होगा हाल ही में भारतीय वायुसेना ने लड़ाकू विमान उड़ाने के लिए महिला पायलट नियुक्त की हैं। आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां महिलाओं का वर्चस्व ना हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि आज की भारतीय महिलाएं ही ऐसा कारनामा कर रही हैं। आज से 80 साल पहले 1936 में ही एक भारतीय महिला ने हवाई जहाज उड़ाया था। चौंकिए नहीं, उस महिला का नाम 'सरला ठकराल' है और उन्होंने ये कारनामा साड़ी पहनकर किया था।
80 साल पहले इस भारतीय महिला ने किया था बड़ा कारनामा, पढ़िए पूरी कहानी
आपको जरूर अचरज हो रहा होगा कि 1936 में जब देश आजाद भी नहीं था, तब एक महिला ने इतना साहसिक कदम कैसे उठाया होगा। जिस क्षेत्र को सिर्फ पुरुषों की जागीर माना जाता था उसमें अपना वर्चस्व कायम कर सरला ठकराल ने सभी धारणाओं को तोड़ दिया था और भारत की पहली महिला पायलट बनीं। 1914 में दिल्ली में जन्मी सरला ठकराल ने परंपराओं को तोड़ते हुए एयरक्राफ्ट उड़ाया था। उन्होंने उस समय के 2 सीटों वाले सबसे एडवांस हवाई जहाज 'जिप्सी मॉथ' को अकेले ही उड़ाना का कारनामा किया था और वो भी साड़ी पहनकर ऐसा करने वाली भी वो पहली महिला ही थीं। बता दें कि ऐसा नहीं था कि उन्होंने ये काम कुंवारेपन में किया हो जिस वक्त उन्होंने देश का गौरव बढ़ाने वाला ये काम किया उस वक्त वो 4 साल की बेटी की मां थीं।
80 साल एयरक्राफ्ट उड़ाकर अदम्य साहस का परिचय देने वाली सरला ठकराल की शादी मात्र 16 साल की उम्र में ही पी.डी. शर्मा के साथ हो गई थी। पी.डी. शर्मा एक व्यावसायिक विमान चालक थे। हालांकि उनके पति ने उन्हें बहुत प्रोत्साहित किया। एक साक्षात्कार में सरला ने बताया था कि, उनके पति को पहले भारतीय एयर मेल पायलट का लाइसेंस मिला था। उन्होंने कराची और लाहौर के बीच उड़ान भरी थी। सरला ने आगे बताया कि, 'जब मैंने अपने आवश्यक उड़ान के घंटे पूरे कर लिए, तब मेरे प्रशिक्षक चाहते थे कि मैं सोलो उड़ान भरूं, लेकिन मेरे पति वहां नहीं थे। मुझे मेरे परिवार के सपोर्ट की ज़रूरत थी। मैं उनसे अनुमति लेना चाहती थी। उन लड़कों ने भी मुझसे कभी कोई सवाल नहीं किया, जिन्हें मेरे साथ प्रशिक्षित किया जा रहा था। सिर्फ फ्लाइंग क्लब का एक व्यक्ति जो क्लर्क था, को मेरे उड़ने से आपत्ति थी। अन्यथा मुझे कभी किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा।'
बता दें कि सरला ठकराल को 1000 घंटे की उड़ान पूरी करने के बाद ‘A’ लाइसेंस प्राप्त करने वाली पहली भारतीय के खिताब से भी नवाज़ा गया था। वो ज्यादातर कराची और लाहौर के बीच उड़ान भरती थीं। उन्होंने अपने परिवार से मिले प्रोत्साहन के बारे में कहा था कि, 'हालांकि यह परिवार के बारे में पर्याप्त नहीं है, लेकिन मेरे ससुर जी मुझसे और भी अधिक उत्साहित थे और उन्होंने मुझे फ्लाइंग क्लब में दाखिला दिलाया। मैं जानती थी मैं एक सख़्त पुरुषवादी परंपरा तोड़ रही थी, लेकिन उन्होने मुझे कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि मैं कुछ अलग कर रही हूं।'
जब उनकी ज़िन्दगी में सब कुछ ठीक चल रहा था और साल 1939 में वो कमर्शियल पायलट लाइसेंस लेने के लिए मेहनत कर रही थीं। तो दूसरा विश्व युद्ध छिड़ने के कारण उनको ट्रेनिंग बीच में ही रोकनी पड़ी। उसी दौरान एक विमान दुर्घटना में उनके पति का देहांत हो गया, जिसके बाद उन्होंने कमर्शियल पायलट बनने के अपने सपने को छोड़ दिया और जीवन की दिशा बदल ली। पति के देहांत के बाद वो भारत लौट गईं। उस समय वो केवल 24 साल की थीं। भारत आने के बाद उन्होंने 'मेयो स्कूल ऑफ़ आर्ट' में एडमिशन ले लिया और पेंटिंग सीखी, साथ ही फ़ाइन आर्ट में डिप्लोमा भी प्राप्त किया।