कर्नाटक में ऑपरेशन कमल 3.0 शुरू, अब क्या होगा?
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2008 में कर्नाटक में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई थी तब पार्टी नेताओं ने बहुमत हासिल करने के लिए ऑपरेशन कमल की तरकीब ईजाद की थी। 224 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा को 110 सीटें मिलीं थीं। वो बहुमत से दो सीट दूर थी। बहुमत हासिल करने के लिए बीजेपनी नेतृत्व ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के मार्गदर्शन में कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को अपनी ओर खींचा। विधायकों ने निजी कारण बताकर इस्तीफे दिए थे। विधायक पद से इस्तीफा देने के बाद भाजपा ने इन विधायकों को अपने टिकट दिए और ये चुनकर फिर से सदन में पहुंच गए। ऑपरेशन कमल में हिस्सा लेने वाले आठ विधायकों में से पांच ही जीतने में कामयाब रहे। बाक़ी तीन को मतदाताओं ने हरा दिया। ये ऑपरेशन कमल 1.0 था।
केंद्र में सत्ताधारी भाजपा मोदी लहर में राज्य में सत्ता तक पहुंचने के लिए आश्वस्त दिख रही थी। लेकिन ये जोश तब ठंडा पड़ गया जब रुझानों में भाजपा 108 से ऊपर का आंकड़ा नहीं पकड़ सकी और अंततः पूरे नतीजे आने तक 104 सीटों पर जाकर रुक गई। 80 विधायक लाने वाली कांग्रेस ने 37 विधायक लेकर आई जनता दल सेक्यूलर को सरकार बनाने का न्यौता देकर सबकों चौंका दिया। एचडी कुमारास्वामी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया। दोनों पार्टियों की संख्या को मिलाकर गठबंधन के पास कुल 117 सीटें हो गईं यानी बहुमत से पांच ज्यादा।
बावजूद इसके राज्यपाल वाजूभाई वाला ने गठबंधन को नजरअंदाज़ करके सबसे ज्यादा सीटें लाने वाली भाजपा के येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता दे दिया। येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए पंद्रह दिनों का समय दिया गया। लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और पंद्रह दिनों का समय करके एक दिन कर दिया गया। कांग्रेसी और जेडीएस के विधायकों को लुभाने के लिए भाजपा ने सभी प्रयास किए।सत्ता और पैसे का लालच दिया गया। एक ओर विधानसभा में विश्वास मत पर बहस शुरू हुई तो दूसरी ओर कांग्रेस ने अपने विधायकों को खरीदने की कोशिश के ऑडियो टेप जारी कर दिए। इनमें दावा किया गया कि कांग्रेसी विधायकों को बीजेपी के ताकतवर नेताओं ने ख़रीदने की कोशिश की। येदियुरप्पा ने विश्वास मत पर मतदान होने से पहले एक भावुक भाषण में अपने इस्तीफ़े की घोषणा कर दी और राजभवन की ओर चले गए। राज्यपाल ने एचडी कुमारास्वामी को सरकार बनाने और बहुमत साबित करने का न्यौता दिया।
जून, जुलाई और अगस्त 2018
चर्चाएं चलती रहीं कि अपने भाई रमेश जार्कीहोली को मंत्री बनाए जाने से नाराज सतीश जार्कीहोली पाला बदलकर बीजेपी में जा सकते हैं। लेकिन सतीश जार्कीहोली ने साफ़ कर दिया कि उनका कांग्रेस पार्टी को छोड़ने का कोई इरादा नहीं है। बीजेपी नेता दावा करते रहे कि कांग्रेस और जेडीएस की सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाएगी और लोकसभा चुनावों से पहले गिर जाएगी। कांग्रेस भी मंत्री बनने की चाह रखने वालों की भावनाओं को शांत करती रही। कांग्रेसी विधायक जेडीएस के मंत्रियों के अपने काम न करने को लेकर नाराजगी जाहिर करते रहे। बीजेपी ने स्थिति पर क़रीबी नजर बनाए रखी।