PICS: सुपुर्द-ए-खाक हुए 'मिनी ताजमहल' बनवाने वाले हसन कादरी, अपने पीछे छोड़ गए कई यादें
डिबाई क्षेत्र के गांव पला केसर निवासी फैजुल हसन कादरी अपने पीछे कई यादें छोड़ गए हैं। उन द्वारा बेगम की याद में बनाया गया मिनी ताजमहल, उनकी दान की गई जमीन पर बना तीन मंजिला कन्या इंटर कॉलेज और उनके द्वारा लिखी गई 425 गजल उन्हें हमेशा याद कराती रहेंगी। पला केसर निवासी फैजुल हसन कादरी डाक विभाग में पोस्टमैन के पद पर तैनात रहे। उनकी बेगम तज्जुमुली बेगम थी और उनके कोई संतान नहीं थी। पोस्टमैन के पद पर रहते हुए इमानदारी से काम किया, जिसकी आज भी चर्चा की जाती है। बताया जाता है कि वह अपनी बेगम से बहुत प्यार करते थे।
कादरी ने बेगम के इंतकाल के बाद 24 दिसंबर 2011 में बेगम की याद में मिनी ताजमहल का निर्माण शुरू करवाया तो वह सुर्खियों में आए। उनके ताजमहल को देखने के लिए देश से ही नहीं, विदेशों से भी आने वाले विदेशी पर्यटक भी समय-समय पर आते रहे। इस मिनी ताजमहल पर ‘द रियल थिंग’ नाम की एक डाक्यूमेंट्री भी बनाई गई, जो विश्व भर में अपनी पहचान बनाने के साथ कादरी के नाम को और सुर्खियों में ला खड़ा किया। कादरी ने अपनी बेगम की याद में 425 गजलें भी लिखी। इन गजलों को हर वर्ग के लोग पसंद करते हैं। उनके पास जो जमीन थी, उसमें से कुछ हिस्से में मिनी ताजमहल बनवा दिया और बाद में उसे वक्फ बोर्ड के हवाले कर दिया।
इसके साथ ही उन्होंने एक और अच्छी पहल करते हुए अपनी पहचान को और बढ़ा दिया। उन्होंने बची हुई जमीन पर कन्या इंटर कॉलेज बनवाने का निर्णय लिया। इस दौरान जिले में तत्कालीन डीएम बी चंद्रकला ने उनके इस निर्णय को सराहा नहीं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात करवाकर राजकीय कन्या इंटर कॉलेज का निर्माण करवाने में अहम योगदान दिया। यह इंटर कॉलेज बनकर तैयार हो गया है और सरकार की ओर से इसे चलाने के लिए तैयारी चल रही है। कादरी का अब सड़क दुर्घटना में इंतकाल हो गया, लेकिन वह अपने पीछे कई यादें छोड़ गए हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। जब भी उनका नाम आएगा तो उनके द्वारा किए गए कार्यों को ही नहीं, बल्कि उनकी याद ताजा हो उठेंगी।
अमर उजाला ने कादरी के सपनों में भरी थी उड़ान
फैजुल हसन कादरी ने जब मिनी ताजमहल बनवाने के साथ सुर्खियों में आए तो अमर उजाला ने उनके सपनों में उड़ान भरी थी। उनके द्वारा किए गए सभी कार्यों को अमर उजाला ने प्रमुखता से प्रकाशित करते हुए उनकी बात और समस्याओं को जिला मुख्यालय से लेकर प्रदेश के लखनऊ मुख्यालय के साथ दिल्ली तक आवाज बुलंद करने का काम किया था। वह हमेशा जब भी अखबारों की बात होती थी तो सबसे पहले अमर उजाला का नाम लेकर शुक्रिया करते हुए कहते थे कि यदि अमर उजाला उनकी बात को प्रमुखता से समय-समय पर प्रकाशित नहीं करता तो उनके सपने अधूरे ही रह जाते।