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यहां मुस्लिम भी धूमधाम से मनाते हैं बसंत पंचमी का त्योहार, जानें क्या है वजह

Mon, 22 Jan 2018 02:37 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 22 Jan 2018 02:37 PM IST
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know why muslims also celebrates basanch panchami at this place

यूं तो बसंत पंचमी हिंदुओं का त्योहार है। इस दिन सब पीले रंग के कपड़े पहनते हैं और मां सरस्वती की पूजा कर पीले रंग के फूल अर्पित करते हैं। यह वसंत के मौसम में मनाई जाती है। इस त्योहार पर गीत गाकर खुशियां मनाई जाती हैं। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आखिर मुस्लिम इसे क्यों मनाते हैं।

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इसके पीछे का कारण है हजरत निजामुद्दीन औलिया। वह चिश्ती घराने के चौथे संत थे। उनकी दरगाह पश्चिमी दिल्ली में स्थित है। उनके एक प्रसिद्ध शिष्य अमीर खुसरो थे। शायद ही ऐसा कोई हो जो पहले उर्दू शायर खुसरो को ना जानता हो। दोंनों ही गुरू शिष्यों की दरगाह और मकबरा आमने सामने ही बने हुए हैं। दरगाह में यूं तो बाकी दिन हरे रंग की चादर चढ़ाई जाती है पर बसंत पंचमी पर यहां पीले रंग के फूल भी चढ़ाए जाते हैं। साथ ही यहां बसंत के गाने भी गाये जाते हैं।

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अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा क्यों हता है। इसके पीछे हजरत निजामुद्दी और अमीर खुसरो से जुड़ी एक कहानी है। संत हजरत निजामुद्दीन का एक भांजा था जिसका नाम तकीउद्दीन नूह था। निजामुद्दीन उससे बहुत प्यार करते थे पर बिमारी के कारण उसकी मृत्यु हो गई। जिस कारण वह बहुत उदास हो गए। उनकी यह हालत उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो से देखी नहीं जा रही थी।

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उन्होंने एक दिन कुछ औरतों को पीले वस्त्रों में गाते बजाते हुए देखा। औरतों के हाथों में पीले रंग के गेंदे के फूल थे। खेत भी पीले रंग के सरसों से लहलहा रहे थे। हर तरफ हरियाली और खुशियां बिखरी हुई थीं। इसके बाद अमीर खुसरों ने सोचा कि क्यों ना मैं भी अपने गुरू के लिए कुछ करूं जिससे वह खुश हो जायें। इसके बाद उन्होंने पीले रंग का घाघरा पहन पीला दुपट्टा ओढ़ लिया।

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गले में ढ़ोलक डाल वो गाने बजाने लगे। अपने शिष्य को औरतों के भेस में गाते बजाते देख निजमुद्दीन अपनी हंसी रोक नहीं पाये। इसी दिन को याद कर सूफी मुस्लिम बसंत पंचमी का त्योहार मनाते हैं और उनकी दरगाह पर भी पीले रंग के फूल चढ़ा बसंत के गीत गाते हैं।

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