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Delhi Mundka Fire: शीशा तोड़कर बाहर न कूदती तो जलकर राख हो जाती, सुनीता की जुबानी- कितना भयावह था मंजर
आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली।
Published by: प्रशांत कुमार
Updated Mon, 16 May 2022 03:44 AM IST
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आसमान से झुलसा देने वाली गर्मी में न जाने कितने परिजन अभी भी सुबह से दोपहर और देर शाम तक अपनों के जीने मरने की जानकारी पाने के लिए एक से दूसरे अस्पतालों में भटक रहे हैं। ऐसे ही सुनीता हैं, जिनकी भांजी जशोदा का कुछ पता नहीं चल रहा है। रविवार को वह भरी दोपहर में संजय गांधी अस्पताल की मोर्चरी के सामने बैठकर बुदबुदा रही थीं। इनसे बात हुई, तो बहते आंसुओं के साथ उन्होंने कहा, कुछ ही क्षणों की बात थी, शीशा तोड़कर वह दूसरी मंजिल से न कूदी होतीं, तो जलकर राख हो गई होतीं।
मुंडका की आग वाली बिल्डिंग में सुनीता अंदर ही फंसी थीं। इस बिल्डिंग में केमिकल का काम होता था, वहीं पर वो नौकरी करती थीं। बड़ी देर तक सांत्वना देने के बाद उन्होंने उस भयावह मंजर को यादकर सुनाया। जब आग लगी तो वह तीसरी मंजिल पर थीं। निचली मंजिल पर आग लगने का शोर मचा, तो वह बाकी लोगों के साथ भागकर दूसरी मंजिल पर आईं। साथ में उनकी भांजी जशोदा भी थी।
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दूसरी मंजिल के नीचे जीने की सीढ़ियों पर तेजी से आग लगी हुई थी। दूसरी मंजिल पर मौजूद लोगों ने तुरंत ही खिड़की पर लगा कांच तोड़ने का निर्णय लिया। कंपनी चलाने वाले शीशा नहीं तोड़ने दे रहे थे। लेकिन लोगों ने उनकी एक न सुनी और खिड़की का शीशा तोड़ दिया गया। अब एक-एक कर लोग फटाफट दूसरी मंजिल से नीचे कूदने लगे थे। क्योंकि इससे ऊपर वाली मंजिल से नीचे कूदने पर बचने की उम्मीद कम थी।
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सुनीता ने अपने से पहले भांजी जशोदा को नीचे कूदने के लिए कहा, लेकिन वह कूदने से डर रही थी। इधर आग बढ़ती जा रही थी, तभी किसी ने हाथ पकड़ाकर सुनीता को नीचे की तरफ लटकाया और वह नीचे गिर गईं।
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उनकी कमर और हांथ में चोट लगी, लेकिन उनकी जान बच गई। सुनीता बताती हैं कि उनकी भांजी नहीं कूद पाई, कुछ ही पल में दूसरी मंजिल पर आग लग जाने के बाद वह तीसरी मंजिल पर गई होगी, इसके बाद उसके साथ न जाने क्या हुआ होगा, ये कहते हुए वह फिर से रोने लगीं।
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सुनीता बार-बार यही कह रही हैं, कि उसका कुछ अता पता नहीं चल रहा है। वह संजय गांधी के अलावा अंबेडकर और सफदरजंग अस्पताल के चक्कर लगा आईं। लेकिन उन्हें पुलिस भी कुछ नहीं बता रही है।
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