दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप, भाजपा और कांग्रेस तीनों के सामने अलग-अलग और बड़ी चुनौतियां हैं। एक तरफ आम आदमी पार्टी है, जो केवल दिल्ली में ही सत्तासीन है। आप के पास खोने के लिए दिल्ली के अलावा और कुछ भी नहीं है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव बेहद महतवपूर्ण है क्योंकि 1998 से अबतक यहां भाजपा वापसी नहीं कर पाई है। कांग्रेस की बात करें तो यह उनके लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई है। शीला दीक्षित के समय लगातार तीन बार सरकार बनाने वाली कांग्रेस 2015 में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। इसलिए इस बार तीनों ही पार्टियों के लिए यह चुनाव मायने रखता है। आपको बता रहे हैं इस बार कौन से चार फैक्टर तय करेंगे कि जीत किसकी होगी-
Delhi Election 2020: ये चार मुद्दे बताएंगे दिल्ली में बनेगी किसकी सरकार
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पिछले पांच साल के काम
इस बार चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री केजरीवाल को अकसर यह अपील करते हुए देखा गया है कि जनता उन्हें केवल पिछले पांच साल के कामों के आधार पर वोट दे। देश के कई चुनावों में यह साफ देखा गया है कि लोकसभा और विधानसभा में लोगों की प्राथमिकता अलग-अलग मुद्दों पर होती है और इसका बड़ा असर नतीजों में दिखाई देता है। केजरीवाल भी दिल्ली में मुफ्त पानी, सस्ती बिजली और सरकारी स्कूल कॉलेजों के लिए किए गए कामों के आधार पर वोट मांगते नजर आ रहे हैं। ऐसे में अगर दिल्लीवासी स्थानीय मुद्दों के हिसाब से वोट देते हैं, तो आम आदमी पार्टी की सरकार सत्ता में वापसी कर सकती है।
मोदी लहर
2014 की ही तरह 2019 के लोकसभा चुनावों में दिल्ली में भाजपा का दबदबा रहा था। वहीं 2013 और 2015 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था। लोकसभा के दोनों चुनाव भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ी और जीत मिली। जबकि, 2013 और 2015 के विधासभा चुनावों में भाजपा ने मुख्यमंत्री चेहरा पहले से ही तय कर लिया था। 2013 में हर्षवर्धन और 2015 में किरण बेदी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाकर भाजपा मैदान में उतरी और दोनों ही बार हार गई। इस बार भाजपा दिल्ली में लोकसभा के तर्ज पर पीएम मोदी के नाम से चुनाव लड़ रही है। ऐसे में अगर मोदी लहर काम करता है तो भाजपा को फायदा हो सकता है।
नागरिकता कानून विरोध
दिल्ली में कांग्रेस की हालत बेहद बुरी है, लेकिन नागरिकता कानून, एनपीआर और एनआरसी को लेकर मुस्लिम बहुल्य इलाकों में जिस तरह का माहौल बना हुआ है उससे कांग्रेस को बड़ा फायदा मिल सकता है। नागरिकता कानून के खिलाफ बैठे प्रदर्शनकारियों के बीच सलमान खुर्शिद जैसे जाने-माने कांग्रेस नेता का पहुंचना उनके बीच पार्टी को लेकर एक नई छवि बना रहा है। खासकर मुस्लिम मतदाता, जिनका 5-10 विधानसभा सीटों पर बड़ा असर है, उनके बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कांग्रेस के पास अच्छा मौका है।
समीकरण
दिल्ली के मतदाताओं का अलग-अलग तबका है, जैसे- पूर्वांचली, उत्तराखंडी, पंजाबी, मुस्लिम आदि। आम तौर पर एक तबके के मतदाताओं का किसी एक पार्टी की ओर झुकाव होता है, लेकिन 2015 में केजरीवाल ने इस मान्यता को तोड़ते हुए रिकॉर्ड 54 प्रतिशत मतों से जीत हासिल की थी। अब इस बार भाजपा पूर्वांचली वोटरों को अपनी ओर कर जीत हासिल करने में लगी है, तो वहीं आम आदमी पार्टी पिछली बार की तरह ही मतदान की उम्मीद कर रही है।