सड़कों पर बसों का ब्रेकडाउन कम कर सकता है 'स्मार्ट बस डिपो'
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सड़क पर बसों का ब्रेकडाउन कम हो, ज्यादा बसें डिपो से बाहर निकलें और अपनी ट्रिप मिस ना करे तो दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मौजूदा बसों की संख्या के साथ भी बेहतर बनाया जा सकता है।
वहीं ब्रेकडाउन कम करके सड़कों पर जाम व प्रदूषण भी कम किया जा सकता है। इसे दूर कर सकता है स्मार्ट बस डिपो यानि स्मार्ट फ्लीट मैनेजमेंट सिस्टम। राजधानी में चलने वाली क्लस्टर बस के राजघाट डिपो ने सिस्टम को अपनाकर सड़क पर 98 फीसदी बसों को उतारा है। राजघाट डिपो बीते एक साल से अधिक समय से इस सिस्टम पर काम कर रहा है।
इस डिपो में कुल 116 बसें हैं। बीते एक माह के आंकड़े बताते हैं कि इनकी औसतन 96 से 98 फीसदी बसें सड़क पर रहीं। खास बात यह है कि सड़क पर चलते-चलते ब्रेकडाउन की समस्या अब ना के बराबर है। अमर उजाला संवाददाता ने जब डिपो का विजिट किया तो पाया कि महज तीन बसें ही डिपो में किसी खराबी के कारण खड़ी हैं। वहीं 113 बसें अपने-अपने रूट पर थी। उधर, डीटीसी की बात करें तो उसके बेड़े में कुल 4300 के करीब बसें हैं। मगर उसकी 14 से लेकर 20 फीसदी तक बसें ब्रेकडाउन रहती हैं।
इसमें या तो वह सड़क पर खड़ी हो जाती है या फिर डिपो से बाहर ही नहीं निकल पाती। इसका कारण बसों का फिटनेस व सर्विस समय पर नहीं होना है। साथ ही इंश्योरेंस नहीं होता है। सिर्फ कमियों की अनदेखी कर सड़क पर उतार दिया जाता है। नतीजतन, सड़क पर ब्रेकडाउन से जाम के साथ प्रदूषण भी होता है।
जानिए कैसे काम करता है फ्लीट मैनेजमेंट सिस्टम
स्मार्ट फ्लीट मैनेजमेंट सिस्टम को बनाने वाले विशाल गुप्ता के मुताबिक, उनके इस सिस्टम को बार्सिलोना में स्मार्ट ट्रांसपोर्टेशन को लेकर 2015 में आयोजित कार्यक्रम वर्ल्ड कांग्रेस में पुरस्कार भी मिल चुका है। अब दिल्ली में कई दूसरे क्लस्टर बस डिपो में इसे लगाने की बातचीत चल रही है। वह दिल्ली सरकार को भी इसे लेकर जल्द प्रस्ताव भेजेंगे।
स्मार्ट ट्रांसपोर्टेशन एक्सपर्ट विशाल गुप्ता ने राजघाट डिपो के इस पूरे फ्लीट मैनेजमेंट सिस्टम को तैयार किया है। उन्होंने बताया कि जब एक नई बस डिपो आती है तो उसका पूरा रिकॉर्ड सिस्टम में अपडेट करते हैं। मसलन गाड़ी का नंबर, फिटनेस, परमिट, इंश्योरेंस, ड्राइवर का नाम, ड्राइविंग लाइसेंस व वैधता जैसी 26 प्वाइंट वाली सूचना अपडेट करते हैं। बस में जीपीएस लगा होता है और रूट चार्ट भी सिस्टम में मौजूद होता है।
इसके अलावा अलग-अलग बस अड्डे पर जहां इस डिपो की बसें जीता हैं, वहां पर अल्ट्रा हाई फ्रीक्वेंस आईडेंटीफिकेशन मशीन लगाते हैं। साथ ही ड्राइवर को एक प्लास्टिक चिप कॉर्ड देते हैं। अगर चालक बिना बस अड्डे में गए आता है तो डिपो में बैठे व्यक्ति को पता चल जाता है और इसे मिस ट्रिप माना जाता है।
विशाल ने बताया कि जब इस सिस्टम में सभी सूचनाएं आ जाती हैं तो सिस्टम खुद ही याद दिलाता है कि बस की सर्विस कब होनी है, इंश्योरेंस खत्म होने की तारीख क्या है और चालक का डीएल एक्सपायर कब हो रहा है। साथ ही इस सिस्टम में एक क्लिक पर यह भी जान सकते हैं कि बस जब से सड़क पर उतरी है, उसका कब-कब एक्सीडेंट हुआ है और किस ड्राइवर किया है।