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नोटबंदी का असर: 300 किलोमीटर की यात्रा में तीन खुशनुमा चेहरे भी नहीं आते याद

Wed, 23 Nov 2016 11:31 PM IST
भूपेंद्र कुमार सिंह/अमर उजाला, नोएडा
भूपेंद्र कुमार सिंह/अमर उजाला, नोएडा Updated Wed, 23 Nov 2016 11:31 PM IST
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amar ujala special coverage on demonetisation in west uttar pradesh 300 kilometer area
note - फोटो : लाल सिंह

एनएच-24 पर दिल्ली से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ठेठ ग्रामीण इलाके अमरोहा तक अमर उजाला की टीम ने गांवों और कस्बों से गुजरते हुए लोगों से बात की। हर जगह लोग नए नोटों की कमी से जूझते दिखे। कैश की यह कमी सबसे ज्यादा किसानों, छोटे दुकानदारों और व्यापारियों को प्रभावित कर रही है। हालत यह है कि किसानों ने परेशान होकर गेहूं की बुआई ही रोक दी है तो व्यापारी इस उधेड़ बुन में हैं कि संकट ज्यादा चला तो घर कैसे चलाएंगे। किसानों का कहना है हम हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं ऐसे बुरे हालात तो कभी नहीं थे। पेश है भूपेंद्र कुमार की रिपोर्ट... (सभी फोटोः लाल स‌िंह)

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एनएच 24 टोल प्लाजा - फोटो : लाल स‌िंह/अमर उजाला

सूना टोल प्लाजा और बैंक की कतारें
सरकार ने सभी टोल प्लाजा पर 24 नवंबर तक टैक्स माफ किया हुआ है। सवेरेे 10 बजे सुनसान से डासना टोल प्लाजा पार करते ही बैंकों और एटीएम के सामने लंबी-लंबी कतारें दिखनी शुरू हो जाती हैं। खासकर सरकारी बैंकों के सामने तो लाइनें और धक्का-मुक्की होती सहज ही दिख जाती है। कस्बे के स्टेट बैंक आफ पटियाला और पंजाब नेशनल बैंक का ऐसा ही हाल था और पूजा फूल भंडार सूना था, भगवान को चढ़ाने के लिए फूल लेेने वाला कोई ग्राहक नहीं था। यही हाल मसूरी कस्बे के केनरा और बैंक आफ बड़ौदा का था।

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खाली पड़े बाजार - फोटो : लाल स‌िंह/अमर उजाला

बाजार में ऐसा सन्नाटा तो कभी नहीं था
करीब 11 बजे बाजार शहरों में भी खुल जाते हैं। गांव देहात के बाजार थोड़ा जल्दी खुलते हैं और जल्दी सिमट जाते हैं, लेकिन बाबू गढ़ छावनी के बाजारों में रौनक नहीं थी। फल बेचने वाले करीमुद्दीन कहते हैं लोगों के पास खुले पैसे नहीं हैं, अब तो हम भी ज्यादा सामान नहीं ला रहे। पता नहीं कैसे आगे काम चलेगा।

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मोगा ढाबा - फोटो : लाल स‌िंह/अमर उजाला

धंधा तो मंदा है... लोग कहां से लाएं पैसा
दोपहर 12 बजे गजरौला के बाहर निकलते ही मोगा पंजाबी ढाबा दिखता है। यहां काउंटर पर बैठे हरदीप कहते हैं, दिक्कत तो है लोगों के पास पैसा ही नहीं है। हालांकि, ज्यादातर लोग 100 के नोट लाते हैं पर कुछ लोग पुराने के लिए भी कहते हैं। धंधा मंदा तो हुआ है, दस हजार की कमाई दो हजार रह गई आने वाले वक्त में बेहतरी की उम्मीद है।

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चश्मे वाला - फोटो : लाल स‌िंह/अमर उजाला

चवन्नी रह गया काम, कौन पहनेगा चश्मा
दोपहर का 1 बजा है, लेकिन अमरोहा के टीपी नगर चौराहे पर चश्मे और टोपियों की रेहड़ी लगाए बैठे जगदीश के हाथों से वक्त फिसलता जा रहा है। आपको क्या बताएं धंधा चवन्नी रह गया, लोगों की जेब में पैसा नहीं है, ऐसे में भला कौन चश्मे पर खर्चा करेगा। फर्नीचर की दुकान पर परेशान अशरफ कहते हैं लोग शादी के लिए बुक आर्डर कैंसल कर रहे हैं। हालात कब बेहतर होंगे समझ में नहीं आ रहा। यही हाल कपड़े की दुकान चलाने वाले शहजाद का है। कहते हैं दिल्ली के बाजार में हमें कोई उधारी नहीं दे रहा, हम भी भला कब तक उधार देंगे।

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