2019 के मौजूदा लोकसभा चुनाव पौड़ी गढ़वाल सीट पर भाजपा के दिग्गज नेता बीसी खंडूड़ी की अग्निपरीक्षा से जुड़ा था। एक तरफ कांग्रेस से उनके पुत्र मनीष खंडूड़ी तो दूसरी तरफ भाजपा से उनके राजनीतिक शिष्य और वर्तमान मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत चुनाव मैदान में थे। इन स्थितियों के बीच खंडूड़ी और उनके राजनीतिक शिष्य तीरथ सिंह रावत के रिश्तों की कहानी बेहद दिलचस्प रही। इस कहानी की अहम कड़ी 1996 के लोकसभा चुनाव से जुड़ी है। जिसकी पृष्ठभूमि में उत्तराखंड राज्य नहीं, तो चुनाव का आंदोलन था। चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार बीसी खंडूड़ी का विरोध हुआ तो तीरथ सिंह रावत अपने साथ बदसलूकी की परवाह न करते हुए आंदोलनकारियों से भिड़ गए। दरअसल, राज्य आंदोलनकारी चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने वाले हर नेता का विरोध कर रहे थे। खंडूड़ी को नामांकन के दौरान आंदोलनकारियों ने घेरने की कोशिश की तो तीरथ उनकी ढाल बन गए। तीरथ इस पूरे चुनाव में खंडूड़ी के साथ साये की तरह मौजूद रहे। गुरु-शिष्य के अटूट रिश्ते की पटकथा यहीं से तैयार हुई। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद रिश्ते को परवान चढ़ते हुए फिर सबने देखा।अपने राजनीतिक कैरियर में बीसी खंडूड़ी पांच बार सांसद रहे। लोकसभा के चार चुनावों में खंडूड़ी के चुनाव संयोजक तीरथ सिंह रावत ही रहे। दरअसल, वर्ष 1991 में जब पहली बार खंडूड़ी को गढ़वाल सीट से भाजपा का टिकट मिला। उस वक्त तीरथ भाजपा में नहीं थे।
उत्तराखंड के नए मुखिया तीरथ और उनके राजनीतिक गुरु बीसी खंडूड़ी के रिश्तों की दिलचस्प है कहानी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Wed, 10 Mar 2021 03:19 PM IST
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