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बचपन से पिता के प्यार को तरसे थे रोहित शेखर, ऐसे हासिल किया हक, फिर अंतिम सांस तक नहीं छोड़ा साथ

Wed, 17 Apr 2019 08:24 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हल्द्वानी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हल्द्वानी Published by: अलका त्यागी Updated Wed, 17 Apr 2019 08:24 AM IST
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Rohit shekhar tiwari life struggle and emotional fact for father ND Tiwari
रोहित शेखर तिवारी - फोटो : अमर उजाला

लंबी जद्दोजहद के बाद पूर्व मुख्यमंत्री स्व. एनडी तिवारी ने रोहित को अपना बेटा माना था और उनकी मां उज्ज्वला से सबके समक्ष 88 साल की उम्र में विवाह करके इस गुमनाम रिश्ते को पवित्र रिश्ते का नाम दिया। इतना कुछ झेलने के बाद जब पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी भी उन्हें बेटा मान लिया तब से पिता की अंतिम सांस तक रोहित शेखर ने एक अच्छे बेटे की तरह अपनी भूमिका निभाई। 

Rohit shekhar tiwari life struggle and emotional fact for father ND Tiwari
रोहित शेखर तिवारी - फोटो : अमर उजाला

11 अप्रैल को वह हल्द्वानी आए और राहुल का हाथ मजबूत करने की बात करते हुए कांग्रेस को ही अपना भविष्य बताया था। अब लोगों को क्या पता था कि राजनीति का यह सितारा उगने से पहले ही अस्त हो जाएगा। वर्ष 1995 में छह साल का बेटा जब अपनी मां के साथ राजनीति के शिखर पुरुष से मिलने पहुंचा तो उसे पता नहीं था कि जिनसे वह मिलने जा रहा है वह उसके पिता हैं, लेकिन सुरक्षा गार्ड उन्हें एक बैठक का हवाला देकर पूर्व सीएम एनडी तिवारी से मिलने नहीं दिया। 
 

Rohit shekhar tiwari life struggle and emotional fact for father ND Tiwari
एनडी तिवारी

मां की कई कोशिशें बेकार चलीं गईं। बताया जाता है कि 15 साल की उम्र में रोहित को उनकी नानी से पता चला कि एनडी तिवारी उनके पिता हैं। इसके बाद मां से वह (रोहित) पिता के घर चलने की जिद करते थे, लेकिन मां झूठा दिलासा देकर बहला देती थी। 18 साल की उम्र में रोहित अपना और मां का हक हासिल करने के लिए आगे बढ़े और पितृत्व याचिका डालने का फैसला किया। रोहित को जानने वाले बताते हैं कि याचिका फाइल करने के कुछ दिनों बाद ही रोहित को हार्ट अटैक आया था और 18 साल की उम्र में वह आंशिक रूप से पैरालाइज हो गए। 

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एनडी तिवारी

स्वस्थ होने पर रोहित 2008 में एक बार फिर कोर्ट पहुंचे। लंबी जद्दोजहद के बाद एनडी तिवारी डीएनए कराने के लिए राजी हुए और 2014 में आखिरकार कोर्ट के दखल के बाद एनडी तिवारी ने उन्हें अपना बेटा मान लिया। यहां से एनडी तिवारी ने बेटे को राजनीति में स्थापित कराने में जुट गए, लेकिन कांग्रेस की सियासत में बिठाए उनके ही मोहरों ने रोहित की राह को आसान नहीं होने दिया। 

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एनडी तिवारी

कांग्रेस में बात नहीं बनती देख एनडी ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह की ओर देखा तो नेताजी ने राजनीति के शिखर पुरुष का ख्याल करते हुए सपा सरकार में रोहित शेखर को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया लेकिन बाद में उनका कार्यकाल नहीं बढ़ाया गया। 2017 में अचानक विधानसभा चुनाव के दौरान रोहित ने बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता ले ली लेकिन विधानसभा चुनाव में मनमुताबिक सीट नहीं मिलने पर उनका मन भाजपा से भी खट्टा हो गया। 

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