PICS: देवभूमि में यहां पड़े थे स्वामी विवेकानंद के कदम
19 सितंबर 1893 को शिकागो के ब्याख्यान के जिस मूल तत्व की वजह से स्वामी विववेकानंद को दुनिया ने सिर-आंखों पर बैठा लिया, कम लोग ही जानते होंगे कि यह ज्ञान उन्हें नैनीताल से बद्रीकाश्रम की ओर जाते वक्त कोसी नदी तट पर पुराने पीपल के पेड़ के नीचे मिला था।
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अपने लंदन प्रवास में आल्पस की पहाड़ियों को देखकर स्वामी जी ने हिमालय की वादियों में एक आश्रम को प्रतिष्ठित करने का संकल्प लिया। स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से स्वामी स्वरूपानंद एवं सेवियर दंपत्ति ने 19 मार्च 1899 में अद्घैत आश्रम की स्थापना की।
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1890 में बद्री नारायण क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ने के कारण श्रीनगर के रास्ते टिहरी होते हुए विवेकानंद देहरादून के पर्वतीय क्षेत्र पहुंचे। राजपुर स्थित बावड़ी के प्राचीन शिव मंदिर में अपने गुरु भाई तुर्यानंद को तपस्यारत देखकर स्वामी जी शिव मंदिर में ही रुक गए एवं लगभग एक पक्ष तक तपस्यारत रहे।
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साल 1890 में स्वामी विवेकानंद कलकत्ते से निकलकर सीधे उत्तराखंड के हिमालय पहुंचे। नैनीताल से बद्रीकाश्रम की ओर होते हुए तीसरे दिन कौसी नदी तट पर पुराने पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान मग्न हो गए। ध्यान टूटने पर उन्होंने अपने साथी गंगाधर से कहा कि आज इस वृक्ष तले मेरे जीवन की एक प्रधान समस्या का समाधान हुआ है। उन्होंने अणु ब्रह्मांड एवं विश्व ब्रह्मांड की एकात्मकता का अनुभव किया। इस विश्व में जो कुछ भी विद्यमान है वही इस देह में है। काकड़ी घाट अल्मोड़ा हुए माइक्रोकॉज्म एवं मैक्रोकॉज्म के सिद्घांत को विवेकानंद द्वारा शिकागो के भाषण में 19 सितंबर 1893 को व्याख्यान का मुख्य विषय बनाया गया।
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1890 में अल्मोड़ा पहुंचने से पहले विवेकानंद एवं अखंडानंद घने वन प्रांत को पार कर करबला के कब्रिस्तान पहुंचे। प्यासे थके हारे नरेंद्र निढाल पड़ गए। तब कहीं जाकर उन्हें यहां के रखवाले फकीर जुल्फिकार अली ने देखा और उनके हाथ में एक पहाड़ी खीरा दिया जिससे वे अपनी प्यास बुझा सके। लेकिन विवेकानंद में इतनी ताकत नहीं थी कि वे इसे खुद खा सकें। फकीर मुसलमान होने के कारण विवेकानंद को खीरा खिलाने में हिचक रहा था, लेकिन विवेकानंद ने उनके हाथ से खीरा खा लिया। फिर जब दोबारा विवेकानंद अल्मोड़ा आए तो सभा में दूर खड़े इस फकीर को मंच पर ले आए और लोगों को बताया कि इस फकीर ने उनकी जान बचाई है।