उत्तराखंड के श्रीनगर में विकासखंड कोट के कांडा स्थित मंजू घोषेश्वर मंदिर में आयोजित मंजूघोष मेले में 39 निशाण (देव प्रतीक) चढे़। मनोकामना पूर्ण होने के बाद दूर-दराज से यहां निशाण चढ़ाने पहुंचे श्रद्धालुओं ने सुख समृद्धि का आशीर्वाद मांगा। मेले के अंतिम दिन बड़ा कांडा के दौरान 19 निशाण चढे़। जबकि पहले दिन छोटा कांडा के दौरान 20 निशाण चढे़ थे। इसी के साथ अब एक माह के लिए मंजूघोषेश्वर मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए हैं।
आज भी इस मंदिर में एक माह के लिए भगवान शिव के साथ एकांत वास में रहती हैं मां भगवती
एक माह तक मंदिर में ही रहेगी मां भगवती
छोटा कांडा के दिन कांडा गांव से मां भगवती मंजूघोषेश्वर में पहुंचती है। मां भगवती की डोली से पहले ग्रामीण मंदिर में पैता (प्रसाद) लेकर पहुंचते हैं। मंजू घोषेश्वर मंदिर को भगवती का मायका बताया गया है। मंदिर के पुजारी द्वारिका प्रसाद भट्ट ने बताया कि मां भगवती एक माह तक महादेव के साथ मंदिर में एकांतवास में रहेंगी। इस दौरान मंदिर में कोई पूजा अर्चना भी नहीं की जाएगी। एक माह बाद मां भगवती की डोली फिर वापस कांडा गांव स्थित मंदिर में जाएगी।
कांडा में आयोजित हो रहे दो दिवसीय मंजूघोष मेले का समापन हो गया। शुक्रवार को बड़ा कांडा के दौरान सबसे पहले उज्याड़ी गांव व अंत में बारें गांव के ग्रामीणों ने निशाण चढ़ाया। मेले में दिन भर ग्रामीण ढोल दमाऊं के साथ निशाण लेकर मंदिर में पहुंचते रहे। मेले का अंतिम दिन होने के कारण यहां श्रद्धालुओं व मेलार्थियों का तांता लगा रहा, जिससे पुलिस को व्यवस्था बनाने में खासी मशक्कत करनी पड़ी। कोतवाल एनएस बिष्ट व श्रीकोट चौकी प्रभारी महेश रावत मय फोर्स पूरे मेले के दौरान यहां मौजूद रहे।
मेला आयोजन समिति के अध्यक्ष द्वारिका प्रसाद भट्ट ने कहा कि मेला समापन के बाद एक माह के लिए मंजूघोषेश्वर मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए हैं। एक माह बाद कांडा गांव में स्थित मंदिर में मां भगवती की डोली विराजमान होगी। इसी के साथ स्टॉप टीयर्स संस्था मेला स्थल की सफाई करेगी। संस्था के प्रमोद बमराड़ा ने कहा कि मेला स्थल पर काफी गंदगी हो गई है। उन्होंने बताया कि मेले के दौरान उनके प्रतिनिधियों ने लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक भी किया। अब वह मेला स्थल पर सफाई अभियान चलाएंगे।
मंजूघोष की मान्यता
मंजूघोष महादेव मंदिर कामदाह डांडा पर स्थित है। शिव पुराण के अनुसार इस पर्वत पर भगवान शंकर ने घोर तपस्या की थी। कामदेव ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए फूलों के वाण चलाकर उनके अंदर कामशक्ति को जागृत किया था। क्रोधित शंकर भगवान ने कामदेव को भष्म कर दिया था। तब से इस पर्वत का नाम कामदाह पर्वत पड़ा। जो कालांतर में कांडा हो गया। दूसरी कथा है कि मंजू नाम की एक अप्सरा ने यहां शक्ति प्राप्त करने के लिए भगवान शंकर की तपस्या की। उस पर श्रीनगर का राजा कोलासुर मोहित हो गया। जब वह अपने मकसद में सफल नहीं हुआ, तो उसने भैंसे का रुप धर ग्रामीणों पर हमला कर दिया। यह मंजू देवी को सहन नहीं हुआ। उसने महाकाली का रुप धर कोलासुर का वध कर दिया। उसी की याद में कांडा मेला मनाया जाता है।