उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बिगड़े हुए बच्चों को रास्तों पर लाने के लिए एक घास का प्रयोग किया जाता है। अब इस 'बिच्छू' घास से कपड़ा बनाया जाएगा।
बिगड़े हुओं को सही रास्ते पर लाती है ये घास, छू लिया तो नहीं झेल पाएंगे टॉर्चर
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जैसा की नाम से ही प्रतीत है। इस घास को गलती से छू जाने से असहनीय दर्द होता है। और बाद में खुजली होती है। पहाड़ी इलाकों में इस घास का प्रयोग बिगड़े बच्चों को सुधारने के लिए किया जाता है। स्कूल और घर लोग अक्सर इस घास के नाम से बच्चों को डराते दिख जाते हैं।
इतना ही नहीं पहाड़ी इलाकों में महिलाओं द्वारा कई बाद शराबी पतियों को सबक सिखाने के लिए भी इस 'बिच्छू' घास का प्रयोग किया जाता है। अक्सर ऐसी मामले देखने को मिलते हैं।
जिला उद्योग विभाग की योजना धरातल पर उतरी तो चमोली जिला बिच्छू घास से तैयार होने वाले कपड़ों में अपनी विशिष्ट पहचान बना सकेगा। विभाग मिनी उद्योग केंद्र कालेश्वर में सामान्य सुविधा केंद्र विकसित कर यहां प्रशिक्षितों से हस्तशिल्प के उत्पाद तैयार करवाएगा। योजना का प्रस्ताव केंद्र और राज्य सरकार को भेजा गया है। योजना के तहत मफलर और अन्य कपड़े यहां तैयार किए जाएंगे।
उद्योग विभाग द्वारा कालेश्वर में नब्बे के दशक में मिनी उद्योग केंद्र की स्थापना की गई थी। यहां विकसित किए गए 66 प्लाटों में जब बीस साल तक उद्योग नहीं लगे, तो विभाग ने प्लाट आवंटन निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। पहले चरण में दो साल पूर्व विभाग ने 30 प्लाट निरस्त किए तो यहां पांच उद्यमियों ने उद्योग स्थापित कर दिए। अन्य 10 औद्योगिक इकाइयों का निर्माण कार्य चल रहा है।