राजा से रंक बनने की कहानियां तो बहुत सुनी हैं, लेकिन राजा से संत बनने वाले प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह पाल की कहानी अनूठी है। वीरेंद्र पाल सिंह पिथौरागढ़ (अस्कोट) के राजशाही पालवंश परिवार के वारिस हैं। वीरेंद्र पाल पीसीएस की नौकरी ठुकरा चुके हैं। धारचूला विधानसभा से भाजपा के टिकट से राजनीति में किस्मत भी आजमा चुके हैं। लेकिन अब आध्यात्मिक शांति की खोज में सांसारिक मोहमाया छोड़कर गेरुआ वस्त्र धारण कर संन्यासी बन गए हैं।
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महामंडलेश्वर वीरेंद्रानंद गिरि
- फोटो : अमर उजाला
जूना अखाड़े में संन्यास की दीक्षा लेने के बाद राजा वीरेंद्र पाल की पहचान वीरेंद्रानंद गिरि हो गई है। आगामी कुंभ में अखाड़े के महामंडलेश्वर की गद्दी पर उनकी ताजपोशी की रस्म की जाएगी। 50 वर्षीय वीरेंद्रानंद फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले संत हैं। राजशाही परिवार में जन्मे वीरेंद्रानंद शिक्षाविद हैं।
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महामंडलेश्वर वीरेंद्रानंद गिरि
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वे 1992 में पीसीएस में चयनित हो चुके हैं। दो साल तक नौकरी करने के बाद उसे ठुकराकर उन्होंने गरीब बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए दस स्कूल खोले। एशियन एकेडमी नाम से संचालित स्कूल सीबीएसई से संबद्ध हैं। वे महर्षि विद्या मंदिर के फाउंडर सदस्य रहे हैं। शिक्षा क्षेत्र में काम करने के बाद 2017 में पिथौरागढ़ जिले की धारचूला विधानसभा से भाजपा के टिकट से चुनाव लड़ चुके हैं।
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महामंडलेश्वर वीरेंद्रानंद गिरि
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वे 24000 वोट हासिल कर कांग्रेस के हरीश धामी से करीब 1200 वोटों से हार गए थे। इसी सीट से 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत उपचुनाव लड़कर जीते थे। मुख्यमंत्री की सीट होने के बाद भी 2017 में कांग्रेस को कांटे की टक्कर दी थी।
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परिवार और समाज की मोहमाया छोड़कर वीरेंद्र पाल को संन्यास की दीक्षा के बाद वीरेंद्रानंद गिरि की पहचान मिली है। प्रयागराज में पौष पूर्णिमा पर जगतगुरु शंकराचार्य वासुदेवानंद की ओर से उनको नया नाम और पहचान दी गई है। हरिद्वार कुंभ में जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर की गद्दी पर उनका अभिषेक होना है।