सांसारिक सुख को त्याग कर संन्यास लेना आसान नहीं होता है और इससे भी मुश्किल हठयोग की राह होती है। इसमें एक हठयोगी अपने शरीर को कठोर तपस्या में झोंक कर ईश्वर को समर्पित कर देता है। सबसे बड़ी बात यह है कि हठयोग केवल परमशक्ति के प्रति निष्ठा और विश्वकल्याण की भावना के साथ किया जाता है। आज सातों शैव संन्यासी अखाड़ों का शाही स्नान है। हिमालय के उत्तुंग शिखरों, घने अरण्यों और मरुस्थलों से नागा संन्यासी व हठयोगी भी शाही स्नान के लिए कुंभ नगरी पहुंचे चुके हैं। नागा संन्यासियों का जीवन बेहद कठिन है, लेकिन हठयोग भी आसान नहीं है। श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के खड़ेश्वरी बाबा एक साल से थारेश्वरी हठयोग कर रहे हैं। उन्होंने अपने दोनों पांव ईश्वर को समर्पित कर दिए हैं। वे खड़े होकर ही सोते है और इसी मुद्रा में अपने नित्यकर्म भी निपटाते हैं। यहां तक कि उन्होंने अपने हठयोग के अनुसार अपना वाहन भी उस तरह बनाया है। यहीं नहीं अपने सोने के लिए एक झूला तक बनाया है। खड़ेश्वरी बाबा ने बताया कि वे विश्व कल्याण और सामाजिक समरसता के लिए हठयोग के मार्ग पर चल रहे हैं। उन्होंने बताया पहले उन्होंने सात साल तक थारेश्वरी योग किया था। बाद में उन्होंने अपने गुरु के आदेश पर तपस्या को बीच में ही रोक दिया था। जब उनका मन नहीं माना तो फिर से हठयोग शुरू कर दिया।
हरिद्वार महाकुंभ 2021ः हठयोग तपस्या की यह राह नहीं आसान, इन बातों को जानकर रह जाएंगे हैरान
श्री तपोनिधि आनंद अखाड़े के हठयोगी दिंगबर दिवाकर भारती ने काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ज्ञानपुर भदोही उत्तर प्रदेश से बीएससी की थी। एक दिन ऐसा आया जब उन्होंने भोग विलास के जीवन को त्याग कर संन्यास ग्रहण कर लिया। संन्यास ग्रहण करने के बाद वे दिन रात ईश्वर की आराधना में लीन हो गए।
आखिरकार वे अपना एक हाथ ईश्वर का समर्पित कर हठयोगी बन गए। दिगंबर दिवाकर भारती वे पांच वर्षों से ऊर्ध्वबाहू हठयोग कर रहे हैं। इसमें एक हाथ खड़ा रख ईश्वर को समर्पित कर दिया जाता है। उन्होंने बताया एक साइंस ग्रेजुएट होकर भी उन्होंने संन्यास इसलिए लिया क्योंकि अध्यात्मिक ज्ञान सर्वोपरि है।
हठ योग प्राचीन भारतीय साधना पद्धति है। इसमें शरीर के आधार पर विभिन्न प्रकार के आसन, प्राण के आधार पर विभिन्न प्रकार के प्राणायाम और इन दोनों के मिश्रण से कई प्रकार की मुद्रा, बन्ध और अन्य क्रियाएं की जाती हैं। इसमें ध्यान भी किए जाते हैं।
दस तरह के होते है हठयोग
- 1 दंडी
ये साधु अपने साथ दंड और कमंडल रखते हैं। दंड बांस का एक टुकड़ा होता है, जो गेरुआ कपड़े से ढंका रहता है। ये किसी धातु की वस्तु को नहीं छूते। ये भिक्षा के लिए दिन में एक ही बार जाते हैं।
- 2. ऊर्ध्वबाहु
ये संन्यासी अपने इष्ट (भगवान) को प्रसन्न करने के लिए अपना एक या दोनों हाथ ऊपर उठाकर रखते हैं।
- 3. आकाशमुखी
जो संन्यासी आकाश की ओर देखते रहते हैं, उन्हें आकाशमुखी कहते हैं। ये एक कठोर साधना है, जो कम ही साधु कर पाते हैं।
- 4. थारेश्वरी
ये संन्यासी दिन-रात खड़े रहने की शपथ लेते हैं। वे खड़े-खड़े ही भोजन करते और सोते हैं। ऐसे साधुओं का हठयोगी भी कहा जाता है।
5. नखी
- जो संन्यासी सालों तक खून नहीं काटते, उन्हें नखी कहते हैं। इनके नाखून सामान्य से 20 गुना तक बड़े हो सकते हैं।