हर साल अक्षय तृतीया के मौके पर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ पावन चारधाम यात्रा की शुरुआत होती है। इस साल सात मई को चारधाम यात्रा की शुरुआत हुई। वहीं नौ मई को केदारनाथ और 10 मई को बदरीनाथ धाम के कपाट आम दर्शनों के लिए खोले गए।
हर साल देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु चारधाम दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। आइए जानते हैं चार धामों का महत्व, इन्हें किसने बनाया और चारधाम यात्रा कब से शुरू हुई। भगवान शिव का धाम केदारनाथ उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग, भगवान विष्णु का धाम बदरीनाथ चमोली में और मां गंगा व यमुना का धाम गंगोत्री-यमुनोत्री उत्तरकाशी जिले में स्थित हैं।
कहा जाता है कि 8वीं-9वीं सदी में आदिगुरु शंकराचार्य ने बदरीनाथ की खोज की थी। भगवान बदरीनाथ की मूर्ति यहां तप्त कुंड के पास एक गुफा में थी और 16वीं सदी में गढ़वाल के एक राजा ने इसे मौजूदा मंदिर में रखा था। केदारनाथ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। 1950 के दशक में यहां धार्मिक पर्यटन के लिहाज से आवाजाही बढ़ी।
स्कंद पुराण के अनुसार गढ़वाल को केदारखंड कहा गया है। केदारनाथ का वर्णन महाभारत में भी है। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों के यहां पूजा करने की बात सामने आती है। माना जाता है कि केदारनाथ मंदिर आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा बनवाया था। बदरीनाथ मंदिर का वर्णन स्कंद पुराण और विष्णु पुराण में वर्णन मिलता है। इसकी खोज भी आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी।
गोरखा समुदाय के लोगों ने कुमाऊं-गढ़वाल 1790 से 1815 तक राज किया था। इस दौरान गंगोत्री मंदिर गोरखा जनरल अमर सिंह थापा ने बनाया था। वहीं यमुनोत्री के असली मंदिर को जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था। हालांकि यह भी कहा जाता है कि यमुनोत्री को टिहरी के महाराज प्रताप शाह ने बनवाया था।