भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक भाईदूज का पर्व उत्तराखंड में धूमधाम से मनाया गया। शुभ मुहूर्त में बहनों ने भाई को तिलक लगा और कलाई पर रक्षासूत्र बांध उनकी लंबी उम्र की कामना की। भाईयों ने भी बहन की रक्षा का संकल्प लेने के साथ ही उन्हें आकर्षक उपहार भी दिए।
धनतेरस के साथ शुरु हुए पंच पर्व का भाईदूज के त्योहार के साथ समापन हुआ। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को मनाए जाने वाले भाई दूज के पर्व का शनिवार दोपहर एक बजे से शुभ मुहूर्त शुरू हुआ। जोकि 03 बजकर 21 मिनट तक रहा। सबसे पहले बहनों ने भाई की आरती उतारी। उसके बाद भाई को तिलक लगाया। चावल के आटे पर विराजे भाई की पूजा के बाद बहन ने भाई की हथेली पर चावल का घोल लगा कर पान, सुपारी, पुष्प इत्यादि रखकर उसके हाथ पर गिराया।
उसके बाद भाई के हाथों में कलावा बांध मिष्ठान खिलाया और गोला दिया। इस दौरान बहनों ने यमराज की पूजा कर भाई की लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन की कामना की। जबकि शाम को भाई की रक्षा के लिए बहनों ने गोधूलि बेला में यमराज के नाम से चौमुखी दीया जलाकर घर के बाहर रखा।
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भाई ने बहन को गिफ्ट किया हेलमेट
- फोटो : अमर उजाला
गोरखाली समुदाय में भाई दूज (भाई टीका) का खास महत्व है। शनिवार को भाईदूज पर गोरखाली समुदाय की बहनों ने भाईयों के माथे पर सप्तरंग का तिलक लगा उनके जीवन में हमेशा रंग भरे रहने की कामना की। भाई दूज पर बहनों ने सुबह फल, अखरोट, दीया और दूब नदी में प्रवाहित किया।
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भाई दूज
- फोटो : अमर उजाला
उसके बाद भाई बहन ने एक दूसरे को फूल, जौ और दूब से बनी माला पहनाई। शुभ समय में बहन ने भाई को सप्तरंगी तिलक लगाया और मिठाई खिलाई। इसके बाद बहन ने आरती उतारकर भाई को गोला दिया। सात रंग के तिलक के पीछे ये मान्यता है, की ये रंग भाई के जीवन में बिखरे रहें।
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भाई दूज
- फोटो : अमर उजाला
इसके बाद बहन ने भाइयों की पूजा कर परिक्रमा की। भाइयों ने भी बहनों की रक्षा करने का संकल्प लेते हुए बहनों को उपहार दिए। इसके बाद बहन ने सेली रोटी, बटूक, फैनी, गोरखाली चटनी आदि भाइयों की खिलाई।
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भाई दूज
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गोरखाली समुदाय की प्रभा शाह ने बताया कि समय के साथ इस त्योहार को मनाने के तरीकों में कुछ बदलाव तो आए हैं, लेकिन महत्व कम नहीं हुआ है। बताया कि इस त्योहार का भाई और बहन को बेसब्री से इंतजार रहता है। सुबह से ही बहनें भाइयों के लिए पारंपरिक पकवान बनाने में जुट जाती हैं।