जब भी सेना का जिक्र होता है तो उसमें कम जनसंख्या घनत्व वाले राज्य उत्तराखंड का नाम गौरव के साथ लिया जाता है। यह माना जाता है कि सेना का हर सौवां सैनिक उत्तराखंड से है। वीरता हो या सेना में भर्ती होने का उत्साह, उत्तराखंड ने इस फलक पर खुद को अव्वल साबित किया है।
सेना दिवस 2019: वीरता की मिसाल देवभूमि के जवान, हर 100वां सैनिक उत्तराखंडी
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आजादी से पहले हो या बाद में, यहां का नाम हमेशा सेना के गौरव से जुड़ा रहा है। हर साल उत्तराखंड के करीब नौ हजार युवा सेना में शामिल होते हैं। राज्य के 1,69,519 पूर्व सैनिकों के अलावा करीब 72 हजार जवान सेवारत हैं। 1948 के कबायली हमले से लेकर कारगिल युद्ध और इसके बाद आतंकवादियों के खिलाफ चले अभियान में यहां के सैनिकों की अहम भूमिका रही है।
खास बात यह है कि यहां के युवा अंग्रेजी हुकूमत में भी पहली पसंद में रहते थे। अंग्रेजों ने यहां के सैनिकों को नेतृत्व के लिए बेहतर पाया था। सैनिकों को प्रशिक्षण देने के लिए अकादमी की नींव 1922 में देहरादून में रखी गई थी। प्रिंस ऑफ वेल्स राय मिलिट्री कॉलेज (आरआईएमसी) दून में ही खोला गया। 1932 में आईएमए की शुरुआत हुई। गढ़वाली, कुमाऊंनी, गोरखा और नागाओं को प्रशिक्षण देने के लिए पर्वतीय हिस्से को चुना गया था।
इसलिए मनाते हैं सेना दिवस
सेना दिवस, हर वर्ष 15 जनवरी को लेफ्टिनेंट जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) केएम करियप्पा के भारतीय थल सेना के शीर्ष कमांडर का पदभार ग्रहण करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उन्होंने 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश राज के समय के भारतीय सेना के अंतिम अंग्रेज शीर्ष कमांडर जनरल रॉय फ्रांसिस बुचर से यह पदभार ग्रहण किया था।
यह दिन सैन्य परेडों, सैन्य प्रदर्शनियों व अन्य आधिकारिक कार्यक्रमों के साथ सभी सेना मुख्यालयों में मनाया जाता है। इस दिन उन सभी बहादुर सेनानियों को सलामी भी दी जाती है, जिन्होंने कभी ना कभी अपने देश और लोगों की सलामती के लिए अपना सर्वोच्च न्योछावर कर दिया।