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नोटबंदी का सबसे बड़ा नेगेटिव इफेक्ट आया सामने, डूबे 10 हजार करोड़

Thu, 01 Dec 2016 10:00 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लुधियाना
ब्यूरो/अमर उजाला, लुधियाना Updated Thu, 01 Dec 2016 10:00 AM IST
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The largest negative effects  note ban,  immersed 10 thousand million
नोटबंदी का असर

आठ नवंबर से 500 एवं 1000 रुपये के नोट बंद होने के बाद आई करेंसी की किल्लत से जहां आम आदमी जूझ रहा है, वहीं उद्योगों पर भी इसका विपरीत असर हो रहा है। हालत यह है कि छोटे उद्योगों में उत्पादन सिमट कर तीस से चालीस फीसदी रह गया है। जबकि इस किल्लत के कारण छोटे उद्योगों को अब तक दस हजार करोड़ रुपये के नुकसान का अंदाजा लगाया जा रहा है। 

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नोटबंदी का असर

उद्यमियों का यह भी मानना है कि चालू वित्त वर्ष में स्थिति ठीक नहीं होगी और इस नुकसान की भरपाई अगले दो साल तक पूरी नहीं हो पाएगी। उद्यमियों ने मांग की है कि बैंकों के ब्याज माफ किए जाएं, बैंक की लिमिट 25 फीसदी तक बढ़ाई जाए और एनपीए की सीमा नब्बे की बजाए 180 दिन की जाए। फेडरेशन ऑफ स्माल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (फासी) के चेयरमैन बदीश जिंदल का कहना है कि हालत यह है कि उद्यमियों के पास रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए पैसे नहीं हैं। 

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नोटबंदी का असर

बैंकों में कैश की भारी कमी है। पांच-पांच घंटे लाइन में लगने के बावजूद रकम नहीं मिल पा रही है। ऐसे में तीस फीसदी उत्पादन भी मुश्किल से हो पा रहा है। पंजाब के छोटे उद्योगों को अब तक दस हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हो चुका है। अभी यह स्थिति सुधरने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। ऐसे में उद्योगों को राहत देना अनिवार्य है। अन्यथा उद्यमियों के समक्ष भी किसानों की तरह आत्महत्याएं करने के  अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

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नोटबंदी का असर - फोटो : अमर उजाला

फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल आर्गेनाइजेशन (फिको) के चेयरमैन एवं नीलम साइकिल्स के एमडी केके सेठ कहते हैं कि  नोटबंदी के बाद इंडस्ट्री पूरी तरह से डिरेल हो गई है। उनका तर्क है कि नीलम साइकिल्स का करीब 250 करोड़ का टर्नओवर है। खर्च चलाने के लिए रोजाना कम से कम दो लाख रुपये की जरूरत है। इतना कैश उतना मिल नहीं रहा है। ऐसे में उत्पादन कम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। 

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नोटबंदी का असर - फोटो : social media

बाजार में साइकिलों की मांग भी जमीन पर आ गई है। इससे बेरोजगारी बढ़ सकती है। यह कानून व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकती है। पंजाब कॉटन फैक्टरीज एंड जिनर्स एसोसिएशन के प्रधान भगवान बांसल कहते हैं कि सीजन के दिनों में भी उद्योग में करेंसी की किल्लत के कारण उत्पादन ठप है। उनका कहना है कि ऐसे में औद्योगिक  उत्पादन लगातार गिर रहा है। अब उद्योगों को बड़ी राहतें देकर ही थामा जा सकता है। 

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