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भारत-पाक सीमा पर दीवार बने 3 बुजुर्ग, पाकिस्तान को दिया खुला चैलेंज

Wed, 05 Oct 2016 10:26 AM IST
सुरिंदर पाल/अमर उजाला, जालंधर(पंजाब)
सुरिंदर पाल/अमर उजाला, जालंधर(पंजाब) Updated Wed, 05 Oct 2016 10:26 AM IST
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surgical strike in pok, three old man stand as wall on border and open challange to pakistan
बॉर्डर से सटे गांव में दीवार की तरह डटे तीन बुजुर्ग - फोटो : अमर उजाला
तीनों का हौंसला गजब का है। तीनों ने 1965 व 1971 की जंग खुद अपनी आंखों से देखी है बल्कि उस जंग में भी वह सीमा से टस से मस नहीं हुए।
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बॉर्डर से सटे गांव में दीवार की तरह डटे तीन बुजुर्ग - फोटो : अमर उजाला
पाकिस्तान बार्डर से 10 कदम दूर गांव स्लाच।  यहां से महज दस कदम की दूरी पर पाकिस्तान व भारत को बांटने वाली कंटीली तारें लगी हैं। गांव की आबादी करीब 600 लोगों की है। इसी गांव के पास चक्करी गांव भी स्लाच पंचायत के अधीन आता है। गांव की सरपंच महिला रणदीप कौर है। गांव के पास जहां बीएसएफ की टीम ने अपना दरवाजा किसानों के लिए बना रखा है वहीं कुछ कदम दूरी पर गांव चक्करी में बीएसएफ ने अपनी पोस्ट बना रखी है। गांव के लोगों के चेहरों पर अमन और शांति आसानी से देखी जा सकती हैं। इसका मुख्य कारण है गांव के तीन बुजुर्ग।
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सर्जिकल स्ट्राइक के चलते हाईअलर्ट के बाद सुरक्षित ठिकानों की ओर जाते लोग - फोटो : अमर उजाला
रत्न सिंह (72), जगीर सिंह (80), बख्शीश सिंह (75) साल। जगीर और रत्न सिंह सगे भाई हैं जबकि बख्शीश सिंह उनके चचेरे भाई है। तीनों भाइयों का हौंसला गजब का है। आत्मविश्वास से लबरेज तीनों भाइयों ने 1965 व 1971 की जंग खुद अपनी आंखों से न केवल देखी है बल्कि उस जंग में भी वह सीमा से टस से मस नहीं हुए। रतन सिंह ने बताया कि 1971 की जंग में तो तोप के गोले गांव के ऊपर से निकलते थे। वह देखते थे और आवाज सुनते थे। आवाज गांव के ऊपर आकर रुक जाए तो समझ जाते थे कि गोला यहीं पर फटेगा और अगर आवाज आगे निकल जाए तो चिंता नहीं।
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सर्जिकल स्ट्राइक के चलते हाईअलर्ट के बाद सुरक्षित ठिकानों की ओर जाते लोग - फोटो : अमर उजाला
तीनों बुजुर्गों ने पूरे गांव को हौंसला दिया हुआ है। एक भी परिवार ने गांव से पलायन नहीं किया है। उनकी जमीन कंटीली तार से पार है। तीनों भाई रोजाना बीएसएफ की कंटीली तार पार कर खेतीबाड़ी के जीरो लाइन पर जाते हैं।  रत्न सिंह ने बताया कि भाई साहिब को गांव के कई लोगों को चिंता हुई थी। रोजाना अधिकारी लाल बत्ती वाली गाड़ियों में चले आते हैं। उन्होंने भी ठान लिया कि क्यों जाएं हम अपनी फसलों को छोड़कर। सारी रात छतों पर बैठकर पहरा देते थे, पूरी तैयारी के साथ जागते थे, कोई आए तो सही। अब भी हम तैयार हैं और पूरा गांव साथ है।

 
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सर्जिकल स्ट्राइक के चलते हाईअलर्ट के बाद सुरक्षित ठिकानों की ओर जाते लोग - फोटो : अमर उजाला
हमारे आगे बीएसएफ की टुकड़ी है तो डर किस बात का। घर में पशु हैं, इनको चारा कौन देगा। हमें इनके लिए चारा तो कंटीली तार को क्रास कर ही लाना पड़ेगा न। रत्न सिंह का एक बेटा जसवीर भारतीय सेना में है और खुद रत्न सिंह आर्मी में लंबे समय तक बतौर हवलदार सेवा करते रहे हैं। छाती पर हाथ रखकर वह कहते हैं कि हम तीनों भाई जब तक जिंदा हैं खुद बार्डर पर भी लड़ने की हिम्मत रखते हैं। हंसते हुए उन्होंने कहा कि इसलिए ही हमारे गांव के किसी बंदे ने पलायन नहीं किया है, 10 किमी तो दूर हम 10 कदम की दूरी पर रहते हैं।

 
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