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Special: सुखना लेक पर आपने ये पेड़ जरूर देखा होगा, ये चंडीगढ़ से भी पुराना है...
रूबी सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 26 Dec 2017 05:49 PM IST
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Sukhna Lake
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सुखना लेक पर लगे पीपल के पेड़ का इतिहास बहुत पुराना है और इसके पीछे एक बहुत बड़ी कहानी छिपी हुई है। देखिए
Sukhna Lake
नेकचंद की नेकी की एक और मिसाल देखिए। बरसों पुराने पीपल के पेड़ को प्रशासन के कारिंदे कुल्हाड़ी लेकर काटने पहुंच गए। पता चलते ही नेकचंद मौके पर पहुंचे और माता की बंधी हुई चुनरी दिखाते हुए बोले-इस पेड़ को काटना मत। गवर्नर साहब की पत्नी यहां पूजा करने आती हैं। पेड़ काटोगे तो उनकी नाराजगी झेलनी होगी। अंजाम पता नहीं क्या हो।
- फोटो : अमर उजाला
नेकचंद का इतना कहना था कि कर्मचारियों के कुल्हाड़ी लिए हाथ थम गए। और समय का खेल देखिए, आज वही पेड़ सिटी ब्यूटीफुल की विरासत का हिस्सा बन गया है। सुखना लेक पर हजारों लोगों को अपनी ठंडी छाया दे रहा है। यह वाकया बताते हुए रॉक गार्डन के जनक नेकचंद के बेटे अनुज सैनी अतीत में खो जाते हैं।
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यह तस्वीर वर्ष 2000 की है, जब नेकचंद और उनके बेटे लाहौर यूनिवर्सिटी में आयोजित कांफ्रेस में हिस्सा लेने पाकिस्तान गए थे।
- फोटो : अमर उजाला
अमर उजाला से बात करते उन्होंने बताया कि उनके पिता को प्रकृति से बहुत प्यार था। उन्होंने झूठी कहानी पेड़ को बचाने के लिए गढ़ी थी। बकौल अनुज-बचपन में नेकचंद ने खुद उन्हें यह किस्सा सुनाया था। याद दिला दें कि चंडीगढ़ प्रशासक ने 21 दिसंबर को सिटी के जिन 31 पेड़ों को हेरिटेज का दर्जा दिया है, उनमें सुखना लेक का वह पीपल का पेड़ भी शामिल है, जिसे नेकचंद ने बचाया था।
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- फोटो : अमर उजाला
250 मीटर दूरी पर है सुखना लेक का यह खूबसूरत पेड़
अनुज बताते हैं कि यह पेड़ 1958 में सुखना लेक के निर्माण से पहले का है। इसे काटने के लिए जब प्रशासन ने कार्रवाई करनी चाही, तो नेकचंद जी ने इसकी रोज निगरानी करनी शुरू कर दी थी। सुखना लेक के अस्तित्व में आने से पहले जन्मे इस पेड़ की छाया उनके पिता को बेहद पसंद थी। काम करते करते जब वे थककर चूर हो जाते थे तो इसके नीचे ही आराम करते थे।
अनुज बताते हैं कि यह पेड़ 1958 में सुखना लेक के निर्माण से पहले का है। इसे काटने के लिए जब प्रशासन ने कार्रवाई करनी चाही, तो नेकचंद जी ने इसकी रोज निगरानी करनी शुरू कर दी थी। सुखना लेक के अस्तित्व में आने से पहले जन्मे इस पेड़ की छाया उनके पिता को बेहद पसंद थी। काम करते करते जब वे थककर चूर हो जाते थे तो इसके नीचे ही आराम करते थे।