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लॉकडाउन : ठप हुए कारोबार, नहीं मानी हार, मुश्किलों पर पाया पार और की नई शुरुआत
Thu, 25 Mar 2021 11:21 AM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Thu, 25 Mar 2021 11:21 AM IST
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चंडीगढ़ में लॉकडाउन का एक साल
- फोटो : फाइल फोटो
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लॉकडाउन के कारण कई लोगों का कारोबार ठप हो गया। वहीं, कइयों की रोजी-रोटी छिन गई। कुछ ने जिंदगी से हार मान ली लेकिन कई लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने मुश्किलों के सामने घुटने नहीं टेके। उनके सामने भी बाधाएं आईं। मुफलिसी के दिन आए, लेकिन हार नहीं मानी। लड़े और डटकर खड़े रहे। तमाम चुनौतियों के बावजूद वे नई शुरुआत करने में सफल रहे। कुछ कामयाब हुए तो कुछ अब भी संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे लोगों में एक बात समान है कि इन लोगों ने हार नहीं मानी। लॉकडाउन के पूरे एक साल होने पर चंडीगढ़ के कुछ ऐसे ही लोगों के संघर्ष की कहानी हम आपको रूबरू करा रहे हैं।
अमरदीप सिंह रंधावा
- फोटो : फाइल फोटो
थाईलैंड में रेस्टोरेंट बंद, मोहाली में की नई शुरुआत
मोहाली के टेस्ट ऑफ अमृतसर रेस्टोरेंट के मालिक अमरदीप सिंह रंधावा की थाईलैंड में सात रेस्टोरेंट की एक चेन थी। 80 से ज्यादा कर्मचारी उनके पास काम कर रहे थे। 22 मार्च को वह भारत आए थे। उसके बाद लॉकडाउन लग गया। फ्लाइट न चलने की वजह से वह यहीं फंसे रह गए। थाईलैंड का भी हाल भारत जैसा था। सन्नाटा पसरा था। कामकाज नहीं होने पर उन्हें अपने सभी रेस्टोरेंट बंद करने पड़े। मोहाली में रहते वक्त जब उन्हें वापस जाने का कोई रास्ता नहीं मिला तो उन्होंने मोहाली के फेज टू में अपनी जमापूंजी से एक नया रेस्टोरेंट खोलने का फैसला किया। नया काम शुरू करना था थोड़ा मुश्किल था। शुरुआत में धंधा मंदा रहा। निराशा ने भी घेरा, मगर अमरदीप ने हार नहीं मानी। काफी प्रयास से उनका रेस्टोरेंट चल पड़ा। उनका कहना है कि उनके जैसे कई लोग हैं, जो अब भी लॉकडाउन का दंश झेल रहे हैं। ऐसे लोगों की सरकार को मदद करनी चाहिए।
मोहाली के टेस्ट ऑफ अमृतसर रेस्टोरेंट के मालिक अमरदीप सिंह रंधावा की थाईलैंड में सात रेस्टोरेंट की एक चेन थी। 80 से ज्यादा कर्मचारी उनके पास काम कर रहे थे। 22 मार्च को वह भारत आए थे। उसके बाद लॉकडाउन लग गया। फ्लाइट न चलने की वजह से वह यहीं फंसे रह गए। थाईलैंड का भी हाल भारत जैसा था। सन्नाटा पसरा था। कामकाज नहीं होने पर उन्हें अपने सभी रेस्टोरेंट बंद करने पड़े। मोहाली में रहते वक्त जब उन्हें वापस जाने का कोई रास्ता नहीं मिला तो उन्होंने मोहाली के फेज टू में अपनी जमापूंजी से एक नया रेस्टोरेंट खोलने का फैसला किया। नया काम शुरू करना था थोड़ा मुश्किल था। शुरुआत में धंधा मंदा रहा। निराशा ने भी घेरा, मगर अमरदीप ने हार नहीं मानी। काफी प्रयास से उनका रेस्टोरेंट चल पड़ा। उनका कहना है कि उनके जैसे कई लोग हैं, जो अब भी लॉकडाउन का दंश झेल रहे हैं। ऐसे लोगों की सरकार को मदद करनी चाहिए।
अनिल महाजन।
- फोटो : अमर उजाला
कपड़े और जूतों का कारोबार ठप हुआ तो स्पेशल मैट बनाकर बेचे
चंडीगढ़ सेक्टर-49 निवासी अनिल महाजन का जूते और कपड़ों का कारोबार था। लॉकडाउन में उनका काम बंद हो गया। निराश होने के बजाय वह नई राह तलाशने में जुट गए। मित्र से बातचीत करने के बाद पहले मास्क और सैनिटाइजर बनाने का काम शुरू किया। फिर कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर एक ऐसा फुटमैट तैयार किया, जो जूते को सैनिटाइज करता है। साथ ही आक्सीजन कैन भी तैयार किया, जो सिलेंडर के विकल्प के तौर पर काम करता है। उनके दोनों ही काम चल पड़े। अनिल महाजन का कहना है कि मुश्किलें चाहे जितनी आएं, लेकिन कभी सकारात्मक सोच को नहीं छोड़ना चाहिए। आगे बढ़ने से ही रास्ते मिलते हैं। शुरुआत में मुश्किलें जरूर आएंगी। ये मुश्किलें ही परीक्षा लेती हैं और जो पास होता है, वही सफल होता है।
चंडीगढ़ सेक्टर-49 निवासी अनिल महाजन का जूते और कपड़ों का कारोबार था। लॉकडाउन में उनका काम बंद हो गया। निराश होने के बजाय वह नई राह तलाशने में जुट गए। मित्र से बातचीत करने के बाद पहले मास्क और सैनिटाइजर बनाने का काम शुरू किया। फिर कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर एक ऐसा फुटमैट तैयार किया, जो जूते को सैनिटाइज करता है। साथ ही आक्सीजन कैन भी तैयार किया, जो सिलेंडर के विकल्प के तौर पर काम करता है। उनके दोनों ही काम चल पड़े। अनिल महाजन का कहना है कि मुश्किलें चाहे जितनी आएं, लेकिन कभी सकारात्मक सोच को नहीं छोड़ना चाहिए। आगे बढ़ने से ही रास्ते मिलते हैं। शुरुआत में मुश्किलें जरूर आएंगी। ये मुश्किलें ही परीक्षा लेती हैं और जो पास होता है, वही सफल होता है।
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अपनी मां के साथ हरकीरत।
- फोटो : अमर उजाला
पारंपरिक कारोबार बंद हुआ तो सपनों को दी उड़ान, खोला खुद का रेस्टोरेंट
कोरोना ने उन लोगों को भी मौका दिया, जो किसी कारणवश अपनी इच्छा के मुताबिक कैरियर नहीं बना पाए थे। सेक्टर-38 निवासी हरकीरत ने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की थी। उनके परिवार का क्रेशर का कारोबार है। परिवार की वजह से उन्हें भी इसी काम में आगे बढ़ना पड़ा। लॉकडाउन में काम बंद हुआ तो हरकीरत ने अपना कुछ नया काम करने के बारे में सोचा। सेक्टर-36 में उन्होंने एक रेस्टोरेंट खोला। यहां पर शाकाहारी व मांसाहारी दोनों तरह के व्यंजन मिलते हैं। बेटे की मेहनत व त्याग देखकर अब उनकी मां सरकारी नौकरी छोड़कर उनके साथ जुट गई हैं। हरकीरत कहते हैं कोरोना ने उनके सपनों की उड़ान दी। उनके अंदर छिपे जज्बे को बाहर निकाला है।
कोरोना ने उन लोगों को भी मौका दिया, जो किसी कारणवश अपनी इच्छा के मुताबिक कैरियर नहीं बना पाए थे। सेक्टर-38 निवासी हरकीरत ने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की थी। उनके परिवार का क्रेशर का कारोबार है। परिवार की वजह से उन्हें भी इसी काम में आगे बढ़ना पड़ा। लॉकडाउन में काम बंद हुआ तो हरकीरत ने अपना कुछ नया काम करने के बारे में सोचा। सेक्टर-36 में उन्होंने एक रेस्टोरेंट खोला। यहां पर शाकाहारी व मांसाहारी दोनों तरह के व्यंजन मिलते हैं। बेटे की मेहनत व त्याग देखकर अब उनकी मां सरकारी नौकरी छोड़कर उनके साथ जुट गई हैं। हरकीरत कहते हैं कोरोना ने उनके सपनों की उड़ान दी। उनके अंदर छिपे जज्बे को बाहर निकाला है।
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दीपाली
- फोटो : अमर उजाला
नहीं हारीं दीपाली, फिर से शुरू किया कोचिंग सेंटर
लॉकडाउन के दौरान लगभग सात महीने तक कोचिंग संस्थान बंद रहे। इससे सेक्टर-40 में बारहवीं क्लास तक का कोचिंग सेंटर चलाने वाली दीपाली को चौतरफा मार झेलनी पड़ी। सिंगल मदर दीपाली ने बताया कि उनके ऊपर दोनों बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी थी। कोचिंग सेंटर किराए की जगह पर चलता है। उसके किराए का कर्ज उन पर चढ़ता रहा। जो जमापूंजी थी, उससे घर का खर्च चलाया। एक वक्त पर उन्हें कुछ जेवर भी बेचने पड़े, जो उन्होंने अपनी बेटी के लिए बनवाए थे। सात महीने तक वह घर पर ही बैठी रहीं। एक बार मन में विचार भी आया कि इस प्रोफेशन को बदल दें, लेकिन समस्या यह थी कि इसके बदले करें क्या? इस दौरान काफी सारी मुश्किलें आईं। वे कई बार टूटीं भी, लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी। दिसंबर में जब कई सख्तियों के बीच कोचिंग खुली तो उन्होंने अपनी कोचिंग का फिर से प्रचार-प्रसार किया। विद्यार्थी तो आए, लेकिन उतने नहीं, जितने पहले आते थे। इन सबके बावजूद वे डटी हैं। दीपाली ने बताया कि मकान मालिक ने किराए पर छूट दी, जिससे उन्हें राहत मिली। उन्हें उम्मीद है कि समय के साथ उनके कोचिंग संस्थान की रौनक फिर से लौट आएगी।
लॉकडाउन के दौरान लगभग सात महीने तक कोचिंग संस्थान बंद रहे। इससे सेक्टर-40 में बारहवीं क्लास तक का कोचिंग सेंटर चलाने वाली दीपाली को चौतरफा मार झेलनी पड़ी। सिंगल मदर दीपाली ने बताया कि उनके ऊपर दोनों बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी थी। कोचिंग सेंटर किराए की जगह पर चलता है। उसके किराए का कर्ज उन पर चढ़ता रहा। जो जमापूंजी थी, उससे घर का खर्च चलाया। एक वक्त पर उन्हें कुछ जेवर भी बेचने पड़े, जो उन्होंने अपनी बेटी के लिए बनवाए थे। सात महीने तक वह घर पर ही बैठी रहीं। एक बार मन में विचार भी आया कि इस प्रोफेशन को बदल दें, लेकिन समस्या यह थी कि इसके बदले करें क्या? इस दौरान काफी सारी मुश्किलें आईं। वे कई बार टूटीं भी, लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी। दिसंबर में जब कई सख्तियों के बीच कोचिंग खुली तो उन्होंने अपनी कोचिंग का फिर से प्रचार-प्रसार किया। विद्यार्थी तो आए, लेकिन उतने नहीं, जितने पहले आते थे। इन सबके बावजूद वे डटी हैं। दीपाली ने बताया कि मकान मालिक ने किराए पर छूट दी, जिससे उन्हें राहत मिली। उन्हें उम्मीद है कि समय के साथ उनके कोचिंग संस्थान की रौनक फिर से लौट आएगी।