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रमजान का तीसरा जुमा, मस्जिद में उमड़े नमाजी, देखिए तस्वीरें

Fri, 24 Jun 2016 08:22 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Fri, 24 Jun 2016 08:22 PM IST
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रमजान के जुमे में चंडीगढ़ की मस्जिद में नमाज पढ़ते लोग - फोटो : अमर उजाला
रमजान के तीसरे जुमे पर मस्जिद में नमाजियों की भीड़ रही। बड़ी संख्या में लोग दोपहर की नमाज में मस्जिद में पहुंचे। देखिए तस्वीरें।
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रमजान के जुमे में चंडीगढ़ की मस्जिद में नमाज पढ़ते लोग - फोटो : अमर उजाला
नमाज के बाद लोगों ने खरीदारी भी की। सेक्टर-20 स्थित जामा मस्जिद के बाहर ग्राउंड में बड़ी संख्या में दुकानें सजाई गई। हर प्रकार के घरेलु सामान खाने पीने से लेकर कपड़े व अन्य सामानों की लोगों ने खरीदारी की। सेक्टर-26 के नुरानी मस्जिद के मुफ्ती मोहम्मद अनस कासमी का कहना है कि रमजान की हर घड़ी पवित्र और नेकियों से भरी हुई है। लेकिन जब रमजान में जब जुमा का दिन आता है तो पवित्रता और बढ़ जाती है। ऐसा लगता है जैसे नूर और रहमत का संगम हो गया हो।
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रमजान के जुमे में चंडीगढ़ की मस्जिद में नमाज पढ़ते लोग - फोटो : अमर उजाला
मोहम्मद अनस कासमी कहते हैं कि रमजान और जुमे की इसी महत्ता की वजह से सुबह सवेरे से ही छोड़ और बड़े सब लोग जुमा की नमाज की तैयारियों में लग जाते हैं। देर तक नमाज ए जुमा पढ़ते हैं। देश में शांति, इनसानियत की भलाई और भाईचारे के लिए दुआएं की जाती है। खुशी पवित्रता और रूहानियत की वजह से पूरा समां ईद जैसा हो जाता है। क्योंकि जुमा का दिन भी हफ्तेवारी ईद का दिन है। जिसमें अल्लाह तआला खुश होकर  बंदों को उनके नेक अमल का सत्तर गुणा बदला देते हैं।
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रमजान के जुमे में चंडीगढ़ की मस्जिद में नमाज पढ़ते लोग - फोटो : अमर उजाला
रमजान का पहला अशरा(पहला 10 दिन) रहमत कहलाता है। दूसरा अशरा मगफिरत और तीसरा अशरा जहन्नुम से आजादी के दिन हैं। रमजान के अंतिम आशरे की रातों में से एक रात शब ए कद्र कहलाती है। यह बहुत ही नेकियों और बरकत वाली रात है। जिसमें अल्लाह की इबादत करने को कुरआन में हजार महीनों की इबादत पूरी जिंदगी की इबादत करने से बेहतर है। शब एक बद्र रामजान की 21, 23, 25, 27 और 29 में से किसी एक रात में होती है। इस अजीम शब की बरकत और पवित्रता हासिल करने के लिए सबसे अच्छा तरीका ऐतिकाफ है।

 
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रमजान के जुमे में चंडीगढ़ की मस्जिद में नमाज पढ़ते लोग - फोटो : अमर उजाला
सवाब की नियत से मर्द पूरे 10 दिन मसजिदों में और औरतें घरों में अल्लाह की इबादत में तल्लीन हो जाते हैं। इस तरह से रमजान के पूरे महीने को रोजे, नमाज और जकात की इबादत और दुआओं से सजाकर बंदों को यह विश्वास हो जाता है कि उनके रब ने उनकी आत्मा को पवित्र और नर्क से मुक्त कर दिया है। इसी की खुशी में ईद उल फितर का त्योहार मनाया जाता है। मुफ्ती मोहम्मद अनस कासमी का कहना है कि यदि पूरे 30 रोजे हुए तो ईद 7 जुलाई को मनाई जाएगी।
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