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इसे कहते हैं जुनून, पिता की मौत..मां कोमा में, पर अंतिम विदाई देने को ट्रेनिंग नहीं छोड़ी
Mon, 08 Jan 2018 01:17 PM IST
रूबी सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़
रूबी सिंह/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 08 Jan 2018 01:17 PM IST
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हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर
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पिता की मौत हो गई, मां का सदमा लगा और वो कोमा में चली गई, लेकिन अंतिम विदाई देने के लिए ट्रेनिंग कैंप नहीं छोड़ा। गजब के जज्बे की दिलचस्प कहानी।
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Balbir Singh Senior
- फोटो : अमर उजाला
बात हो रही है, हॉकी के महान खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर की। 1948 में पहली बार विदेशी धरती लंदन में भारत का तिरंगा फहराने वाला वो दिन आज भी याद कर हॉकी के महान खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर देशभक्ति और खेल के जुनून से तरोताजा कर देता है। हॉकी के प्रति उनका जुनून उम्र के 95वें पड़ाव पर आकर भी कम नहीं हुआ है, बल्कि वे हर पल सिर्फ हॉकी को जीते है।
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3 बार ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता
पिता को अंतिम विदाई के लिए नहीं ली थी छुट्टी
हॉकी के प्रति उनका जुनून इस कदर था कि जब 1975 में भारतीय टीम के ट्रेनिंग कैंप के दौरान उनके पिता का देहांत हो गया था तो वे सिर्फ कुछ घंटे के लिए ही उनको अंतिम विदाई देने गए। उसी दिन वापस आकर वे कैंप में अपने खिलाड़ियों के साथ सोए थे। यहीं नहीं, पिता के देहांत का सदमा उनकी पत्नी सुनील झेल न पाई और कोमा में चली गई, लेकिन उन्होंने कैंप नहीं छोड़ा।
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3 बार ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता
शनिवार को अमर उजाला संवाददाता जब उनसे मिलने गई तो वे थोड़ा बीमार थे और कमरे में आराम कर रहे थे। लेकिन बेटी सुशबीर ने कई रोचक किस्से बताना शुरू किए। जैसे ही वे बताने लगी, आवाज सुनकर बलबीर सिंह कमरे से बाहर आ गए। बोले, बोर हो रहा था, हॉकी की बात सुनकर ठीक हो जाऊंगा। फिर बलबीर सिंह खुद किस्से सुनाने लगे।
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3 बार ओलंपिक गोल्ड मेडल विजेता
उन्होंने बताया कि 40 साल की उम्र में पहली बार अस्थमा की बीमारी का पता चला। मैदान में जब भी सांस चढ़ती थी, सोचता था शायद दौड़ने से चढ़ रहा है। लेकिन बाद में यह अस्थमा निकला। इसके बावजूद मैंने सेंटर फारवर्ड खेलते हुए सबसे अधिक हॉकी गोल का रिकार्ड अपने नाम किया है। 1952 के ओलंपिक के दौरान फाइनल में नीदरलैंड के विरुद्ध खेलते हुए बलबीर सिंह ने पांच गोल कर रिकॉर्ड बनाया था।
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