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कैसे तैयार होते हैं जांबाज ‘कोबरा कमांडो’, नक्सलियों से कैसे लेते हैं लोहा?
शनि शर्मा /अमर उजाला, रोहतक(हरियाणा)
Updated Tue, 09 May 2017 11:31 AM IST
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कोबरा कमांडो
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घने जंगलों में रहकर नक्सलियों से लोहा लेते हैं और अपनी जांबाजी के लिए जाने जाते हैं कोबरा कमांडो। जानिए इस स्पेशल टास्क फोर्स के बारे में।
कोबरा कमांडो
राष्ट्रीय युवा महोत्सव के तहत हरियाणा के रोहतक में स्थित बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय में लगी सेना और अर्द्धसैनिक बलों की प्रदर्शनी में सेना की वीरता की कहानियां बताई जा रही हैं। इन्हीं में से एक है ‘कोबरा कमांडो’। सीआरपीएफ की यह स्पेशल टास्क फोर्स घने जंगलों में रहकर नक्सलियों से लोहा लेती है। कोबरा कमांडो अपनी जांबाजी के लिए जाने जाते हैं। यह अपनी चपलता और चालाकी से दुश्मन को ढेर कर देते हैं।
कोबरा कमांडो
कोबरा कमांडो की दुश्मनों से लड़ने की शैली अब विदेश तक पहुंच गई है। यही वजह है कि यह विश्व की बड़ी सेनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले अमेरिका, रूस और इजराइल की फोर्स को गोरिल्ला वार के गुर सिखा रहे हैं। हर साल या छह महीने में कोबरा यूनिट के कमांडो विदेशी फोर्स को प्रशिक्षण देने जाते हैं। हाल ही में इजराइल से आये कमांडो ने अपनी विंग के बारे में अमर उजाला को बताया।
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कोबरा कमांडो
प्रदर्शनी में बड़े ऑपरेशन में शामिल रहे कोबरा कमांडो भी आये। इनमें एक कमांडो एक करोड़ के इनामी कुख्यात नक्सली मालोजुला कोटेश्वर राय उर्फ किशन जी को मारने वाले ऑपरेशन में भी शामिल रह चुका है। सीआरपीएफ के असिस्टेंट कमांडो राकेश ने बताया कि कोबरा कमांडो ने करोड़ों के दर्जनों इनामी नक्सलियों को मारा है। हालांकि, कई ऑपरेशन में कोबरा कमांडो भी शहीद हुए हैं।
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कोबरा कमांडो
राकेश ने बताया कि नक्सलियों को जमीन में घात लगाकर शिकार बनाते हैं। उत्तर पूर्व के राज्यों में कभी-कभी विदेशी उग्रवादियों से भी भिड़ंत हो जाती है। सीआरपीएफ में भर्ती होने वाले जवानों में से ही कोबरा कमांडो को चुना जाता है। चयन के बाद कोबरा में शामिल करने के लिए जवानों को कभी चार तो कभी नौ महीने का कड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है। कमांडो को कई बार विदेशी फोर्स के साथ संयुक्त प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता है।