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शाबाश बेटी! पढ़ाई भी की...पिता का सहारा भी बनी

Tue, 21 Apr 2015 07:48 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मालेरकोटला
ब्यूरो/अमर उजाला, मालेरकोटला Updated Tue, 21 Apr 2015 07:48 AM IST
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शाबाश बेटी! पढ़ाई भी की...पिता का सहारा भी बनी

beti hi bachayegi: motivational story of a muslim girl

मुस्लिम समुदाय, बहुत गरीब परिवार। सपना उच्च शिक्षा का, पर विपरीत हालात।

ऐसे में इस बेटी ने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि अपनी तकदीर को बदलने में जुटी है। तस्वीरों में पूरी कहानी।

शाबाश बेटी! पढ़ाई भी की...पिता का सहारा भी बनी

beti hi bachayegi: motivational story of a muslim girl

पंजाब के शहर मालेरकोटला में बेहद तंग मोहल्ले खोजगान स्ट्रीट में आरजू का घर है। वह शिया समुदाय से है। उसके पिता फलों की रेहड़ी लगाते हैं। घर का गुजारा मुश्किल से चलता था, बावजूद इसके आरजू का सपना मुस्लिम संस्कृति का पालन करते हुए उच्च शिक्षा हासिल करना था। इसे पूरा करने के लिए आरजू ने पढ़ाई की और सरकारी कन्या हाईस्कूल की दसवीं कक्षा में 80 फीसदी अंक प्राप्त करके दूसरा स्थान प्राप्त किया। आरजू का सपना उच्च शिक्षा प्राप्त करने की चाहत का बोझ अपने बूढे़ पिता कंधों पर कम करना चाहती हूं।

शाबाश बेटी! पढ़ाई भी की...पिता का सहारा भी बनी

beti hi bachayegi: motivational story of a muslim girl

आरजू कहती हैं कि सुबह जल्दी उठकर मैं अपनी मां के साथ घरेलू कामकाज भी निपटाती हूं और स्कूल से लौटकर पार्ट टाइम जॉब पर पहुंच जाती हूं। मैं बाजारू चीजों और फास्ट फूड से कोसों दूर हूं। दिन में पांच वक्त की नमाज पढ़ना मेरी प्राथमिकताओं में शामिल है। पार्ट टाइम जॉब से मुझे घर की आर्थिक हालत सुधारने में मदद मिली है। अब मैं न सिर्फ अपने बूढे़ पिता के साथ घरेलू खर्च में हाथ बंटाती हूं बल्कि अपनी पढ़ाई का भी साधन भी मैंने ढूंढ लिया है। मुझे पूरा विश्वास है कि मैं अपना सपना हकीकत में बदल दूंगी।

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शाबाश बेटी! पढ़ाई भी की...पिता का सहारा भी बनी

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आरजू आजकल पार्ट टाइम जॉब करके न सिर्फ अपनी पढ़ाई का खर्च पूरा कर रही हैं, बल्कि अपने बूढे़ पिता का सहारा भी बन रही हैं।  आरजू की तमन्ना है कि वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बतौर एंकर काम करे। घर की कमजोर आर्थिक स्थिति ने उसके परिवार को कई बार निराश किया, लेकिन लड़की होने के बावजूद उसका हौसला कभी कमजोर नहीं पड़ा।

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आरजू कहती हैं कि घरेलू और सामाजिक समस्याओं के बीच दो कदम आगे बढ़ा पाना काफी चुनौतियां भरा होता है। साथ ही पर्दे में रहकर गैर लोगों से दूरी बनाए रखना और अपने पैरों पर खड़ा होना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। ऐसे में आरजू ने एक हिंदी पत्रिका में संपादन का काम खोज लिया और नौकरी का समय भी ऐसा रखा कि पढ़ाई पर कोई असर न पड़ सके।

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