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यही है सार्थक जिंदगी: अबाबत कौर हैं पीजीआई की सबसे युवा डोनर... बस इतनी सी जिंदगी में किया ये महान काम
Sat, 13 Aug 2022 10:31 PM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 13 Aug 2022 10:31 PM IST
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अबाबत कौर।
- फोटो : अमर उजाला
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अमृतसर के अस्पताल में एक बच्ची ने जन्म लिया। माता पिता की तो जैसे दुनिया खिल उठी। एक पल में बेटी के सुखद भविष्य के हजारों सपने आंखों में आ गए। लेकिन अफसोस ये खुशी ज्यादा दिन नहीं रह पाई। डॉक्टरों ने बच्ची की उम्र कम बताई तो मां-बाप की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। तब अमृतसर के सुखबीर संधू ने वो फैसला लिया जिसने उनकी बच्ची अबाबत कौर संधू के नाम एक रिकॉर्ड जुड़ गया।
पीजीआई की सबसे युवा डोनर।
- फोटो : अमर उजाला
शनिवार को पीजीआई में विश्व अंगदान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे अमृतसर के सुखबीर संधू ने बताया कि जन्म के बाद जैसे बेटी गोद में आई तो लगा कि परी हाथों में है और उसे अब दुनियाभर की खुशी लाकर देनी है। यह ख्वाब मन में चल ही रहे थे कि डॉक्टर आकर बोले कि बेटी के ब्रेन की स्थिति ठीक नहीं है। लगा जैसे वक्त थम सा गया। ख्वाब दुआओं में बदल गए कि वाहेगुरु बेटी की रक्षा करो।
चंडीगढ़
- फोटो : अमर उजाला
इसके बाद चंडीगढ़ पीजीआई आए तब भी बेटी की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। तब पत्नी के साथ बैठकर सोचा कि इस शरीर को पंचतत्व में विलीन हो जाता है तो क्यों न किसी की जिंदगी को बचाकर उसकी छवि दूसरों में देखें। मेरी 39 दिन की बेटी अबाबत कौर संधू हम सबको पीछे छोड़कर महान कार्य कर गई और पीजीआई की युवा डोनर बन गई।
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चंडीगढ़
- फोटो : अमर उजाला
सुखबीर ने कहा कि बेशक बेटी ने 39 दिन ही हमारे साथ बिताए लेकिन फख्र महसूस कर रहा हूं कि उसकी वजह से आजादी के 75वें वर्ष में पीजीआई के तरफ से सम्मान करने के लिए बुलाया गया। यह पुरस्कार मेरी बेटी को समर्पित है। इसका गर्व मुझे हमेशा होते रहेगा। सुखबीर ने बताया कि उनका एक बेटा है लेकिन एक लड़की की भी चाह थी। नवंबर 2020 में यह चाह भी पूरी हुई, लेकिन ज्यादा दिन यह खुशी नहीं मिली।
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चंडीगढ़ पीजीआई
- फोटो : अमर उजाला
सुखबीर एग्रीकल्चर विभाग में हैं और पत्नी स्कूल में विज्ञान की शिक्षक हैं। उन्होंने कहा कि शरीर तो नश्वर है लेकिन अंगों से किसी जरूरतमंद के जीवन में नया सवेरा लाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस पर निर्णय लेना थोड़ा कठिन था लेकिन स्वतंत्रता सेनानी नाना की हौसलाअफजाई से सबकुछ आसान हो गया। उन्होंने कहा कि बेटी के जाने का गम तो ताउम्र सालता रहेगा लेकिन उसके द्वारा लोगों को जो नया जीवन मिला है, वह हमेशा प्रेरणा देगा।