आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें कल का कोई पता नहीं। अभी तो भय ने हमारे जहन पर कब्जा कर रखा है। सामाजिक मेल जोल से दूर हम सभी अपने-अपने घरों में कैद हैं। ताकि नए कोरोना वायरस के संक्रमण की रफ्तार धीमी कर सकें। इस दौरान साहित्य हमारे एकाकीपन को दूर कर रहा है। वो हमें हकीकी दुनिया से दूर ले जा कर राहत देता है। हमारा दोस्त बनता है। मगर, इस दौरान महामारी पर लिखी गई किताबों की मांग भी खूब बढ़ गई है। ऐसे कई उपन्यास हैं, जो महामारी के दौर की वास्तविकता के बेहद करीब हैं। जो पहले की महामारियों की डायरी जैसे हैं। ऐसे उपन्यास हमें बताते हैं कि उस दौर में लोग इस भयावाह आपदा से कैसे बाहर निकले।
कोरोना वायरसः इस महामारी की भविष्यवाणी करने वाले लोग
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डेनियल डेफो की किताब सितंबर 1664 से शुरू होती है। उस समय अफवाह फैलती है कि ताऊन की वबा ने हॉलैंड पर हमला बोला है। इसके तीन महीने बाद, यानी दिसंबर 1664 में लंदन में पहली संदिग्ध मौत की खबर मिलती है। बसंत के आते आते लंदन की तमाम चर्चों पर लोगों की मौत के नोटिस में भारी इजाफा हो जाता है। जुलाई 1665 के आते-आते लंदन में नए नियम लागू हो जाते हैं। ये नियम ठीक वैसे ही हैं, जो आज करीब चार सौ साल बाद हमारे ऊपर लॉकडाउन के नाम से लगाए गए हैं। तब भी लंदन में सभी सार्वजनिक कार्यक्रम, बार में शराबनोशी, ढाबों पर खाना पीना और सरायों में लोगों के जुटने पर पाबंदी लगा दी गई थी। और अखाडों और खुले स्टेडियम भी बंद कर दिए गए थे।
डेनियल डेफो लिखते हैं, "लंदन वासियों के लिए सबसे घातक बात तो ये थी कि बहुत से लोग लापरवाही से बाज नहीं आ रहे थे। वो गलियों में घूमते थे। सामान खरीदने के लिए भीड लगा लेते थे। जबकि उन्हें घर में ही रहना चाहिए था। हालांकि कई ऐसे लोग भी थे, जो इन नियमों का कडाई से पालन करते हुए घरों में ही रहते थे।"
अगस्त का महीना आते-आते, "प्लेग ने बहुत हिंसक रूप धर लिया था। परिवार के परिवार, बस्तियों की बस्तियां इस महामारी ने निगल डाली थीं।" लेकिन, डेनियल डेफो के मुताबिक, "दिसंबर 1665 के आते आते महामारी का प्रकोप धीमा पड़ चुका था। अब हवा साफ और ठंडी थी। जो लोग बीमार पड़े थे, उनमें से कई ठीक हो गए थे। शहर की सेहत सुधरने लगी थी। जब आखिरी गली भी महामारी से मुक्त हो गई, तो लंदन के वासी सडकों पर निकले और खुदा का शुक्र अदा किया।"
चार सौ बरस पहले आई महामारी का माहौल आज से किस कदर मिलता है, ये कहने की बात नहीं। इस वक्त भी लगभग वैसा ही माहौल है। तनाव बढ़ा हुआ है।
डेनियल डेफो की ही तरह अल्बर्ट कामू ने भी महामारी का बखान बडे ही कुदरती अंदाज में किया है। कामू ने अपनी किताब, 'द प्लेग' में अल्जीरिया के ओरां शहर में आई प्लेग की महामारी का वर्णन किया है। उन्नीसवीं सदी में ओरां शहर, प्लेग के कारण वाकई उजड़ गया था। कामू के चित्रण में भी हम आज की झलक देख सकते हैं। पहले तो स्थानीय नेता इस महामारी की आमद को मानने से इनकार करते रहते हैं, जबकि कामू लिखते हैं कि, "शहरों की गलियों में मरे हुए चूहों की भरमार थी।" उनके उपन्यास में एक अखबार का कॉलमनिगार सवाल उठाता है कि, "क्या हमारे शहर के मालिकान को इस बात का एहसास नहीं है कि ये चूहे इंसानों के लिए कितना बड़ा खतरा हैं।"
इस किताब के किस्सागो किरदार डॉक्टर बर्नार्ड, स्वास्थ्य कर्मियों की बहादुरी के बारे में कहते हैं कि,"मुझे पता नहीं है कि मौत किस पल में मेरा इंतजार कर रही है। और आखिर में क्या होगा। अभी तो मैं बस यही जानता हूं कि लोग बीमार हैं और उन्हें इलाज की जरूरत है।" और आखिर में इस महामारी से बचे लोगों के लिए एक सबक भी है कि, "उन्हें अब पता हो गया है कि किसी भी मुश्किल दौर में सबसे अधिक जरूरी चीज होती है इंसान से प्यार करना।"
1918 में स्पेनिश फ्लू की महामारी ने भी दुनिया का रंग रूप बदल डाला था। इस महामारी के चलते दुनिया भर में कम से कम पांच करोड़ लोग मारे गए थे। जबकि इससे ठीक पहले हुए पहले विश्व युद्ध में एक करोड़ लोगों ने जान गंवाई थी। मगर, युद्ध की नाटकीय घटनाओं ने इस महामारी के प्रभाव को छुपा दिया था।
पहले विश्व युद्ध पर तो अनगिनत उपन्यास लिखे गए। पर स्पेनिश फ्लू की महामारी पर भी ढेर सारी किताबें लिखी गई थी। आज लॉकडाउन की वजह से लोग घरों में रह रहे हैं और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। 1939 में ब्रिटिश लेखिका कैथरीन एन पोर्टर ने अपने उपन्यास 'पेल हॉर्स, पेल राइडर' में स्पेनिश फ्लू की महामारी का वर्णन किया है। पोर्टर के उपन्यास की किरदार मिरांडा जब बीमार पडती हैं, तो मिरांडा का दोस्त एडम उन्हें बताता है कि, "ये बेहद बुरा दौर है। सभी थिएटर, दुकानें और रेस्तरां बंद हैं। गलियों में से दिन भर जनाजे निकलते रहते हैं। रात भर एंबुलेंस दौड़ती रहती हैं।"
कैथरीन पोर्टर, मिरांडा के, बुखार और दवाओं के जरिए हफ्तों चली बीमारी के बारे में बताती हैं। जब वो ठीक होती हैं और बाहर निकलती हैं तो देखती हैं कि दुनिया युद्ध और फ्लू के चलते किस कदर बदल चुकी है। खुद कैथरीन भी स्पेनिश फ्लू की वजह से मरते मरते बची थीं।