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इस शख्स के नाम पर पड़ा था गलवां घाटी का नाम, 121 साल पहले हुई थी खोज
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नवनीत राठौर
Updated Wed, 17 Jun 2020 05:05 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
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करीब 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित लद्दाख की गलवां घाटी में भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने हैं। यह घाटी अक्साई चीन इलाके में आती है, जिस पर चीन अपनी नजरें पिछले 60 सालों से गड़ाए बैठा है। 1962 से लेकर 1975 तक भारत-चीन के बीच हुए युद्ध में गलवां घाटी ही केंद्र में रही है। और अब 45 सालों बाद फिर से घाटी के हालात बिगड़ गए हैं। आइए जानते हैं इस घाटी के बारे में विस्तार से...
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गुलाम रसूल गलवां
- फोटो : सोशल मीडिया
गलवां घाटी का नाम लद्दाख के रहने वाले चरवाहे गुलाम रसूल गलवां के नाम पर पड़ा था। सर्वेंट ऑफ साहिब नाम की पुस्तक में गुलाम रसूल ने बीसवीं सदी के ब्रिटिश भारत और चीनी साम्राज्य के बीच सीमा के बारे में बताया है। गुलाम रसूल गलवां का जन्म सन 1878 में हुआ था। गुलाम रसूल को बचपन से ही नई जगहों को खोजने का जुनून था। इसी जुनून की वजह से गुलाम रसूल अंग्रेजों का पसंदीदा गाइड बन गया।
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- फोटो : अमर उजाला
अंग्रेजों को भी लद्दाख का इलाका बहुत पसंद था। ऐसे में गुलाम रसूल ने 1899 में लेह से ट्रैकिंग शुरू की थी और लद्दाख के आसपास कई नए इलाकों तक अपनी पहुंच बनाई। इसी क्रम में गुलाम रसूल गलवां ने अपनी पहुंच गलवां घाटी और गलवां नदी तक बढ़ाई। ऐसे में इस नदी और घाटी का नाम गुलाम रसूल गलवां के नाम पर पड़ा।
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- फोटो : अमर उजाला
गुलाम रसूल गलवां बहुत कम उम्र में ही एडवेंचर ट्रेवलर कहे जाने वाले सर फ्रांसिस यंगहसबैंड की कम्पनी में शामिल हो गया। सर फ्रांसिस ने तिब्बत के पठार, सेंट्रल एशिया के पामेर पर्वत और रेगिस्तान की खोज की थी। अंग्रेजों के साथ रहकर गुलाम रसूल भी अंग्रेजी बोलना, पढ़ना और कुछ हद तक लिखना भी सीख लिया था। 'सर्वेंट ऑफ साहिब्स' नाम की गुलाम रसूल ने ही टूटी-फूटी अंग्रेजी भाषा में लिखी। हालांकि इस किताब का शुरुआती हिस्सा सर फ्रांसिस यंगहसबैंड ने लिखा था।
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- फोटो : अमर उजाला
लेह के चंस्पा योरतुंग सर्कुलर रोड पर गुलाम रसूल के पूर्वजों का घर है। उनके नाम पर यहां गलवां गेस्ट हाउस भी है। यहां आने वालों को गुलाम रसूल के परिजन उनके किस्से सुनाते हैं।
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