टायर गाड़ी का अहम हिस्सा होते हैं। वहीं ये कार और सड़क के बीच की अहम कड़ी हैं। अगर टायर अच्छे हैं, तो ड्राइवर को ड्राइव करने में शानदार अनुभव तो होता ही है, साथ ही उसे गाड़ी को ठीक से नियंत्रित करने का भरोसा भी रहता है। अगर किसी एक टायर में पंक्चर या हवा कम हो, तो अच्छे से अच्छे ड्राइवर का भरोसा डगमगा जाता है। वहीं कुछ लोग टायरों की परवाह ही नहीं करते और गड्ढों आदि में गाड़ी घुसा देते हैं, जिसके टायर तो खराब होते हैं ही, साथ ही उनकी बैलेंसिग आदि में भी समस्या पैदा हो जाती है। जिसका खामियाजा उन्हें भारीभरकम बिल देकर चुकाना पड़ता है। जानते हैं टायरों की सेहत ठीक रखने के लिए क्या है जरूरी...
अब कार के टायर देंगे एक लाख किलोमीटर तक आपका साथ, बस करने होंगे ये तीन जरूरी काम!
व्हील एलाइनमेंट, व्हील बैलेंसिंग और टायर रोटेशन
व्हील एलाइनमेंट, व्हील बैलेंसिंग और टायर रोटेशन, आम तौर पर लोगों को गैर जरूरी लगते हैं, लेकिन ये सभी टायर की लाइफ को बढ़ाने में मदद करते हैं। जब आप कंपनी में गाड़ी सर्विस कराने के लिए जाते हैं तो वहां पर इनका ऑप्शन होता है और सर्विस मैंनेजर इसके लिए आपसे जरूर पूछेगा, हालांकि कंपनी में ये सर्विसेज थोड़ी महंगी होती हैं, लेकिन आ चाहें तो बाहर से भी किसी अच्छी टायर सर्विस शॉप से 300 से 400 रुपये में करवा सकते हैं।
व्हील एलाइनमेंट
कुछ लोगों को व्हील एलाइनमेंट समझ में नहीं आता है, लोग इसे व्हील्स का अडजस्टमेंट समझते हैं, लेकिन असल में यह सस्पेंशन को व्हील्स के साथ अडजस्ट किया जाता है। ताकि टायर का सड़क पर एंगल सही रहे और टायर घिसे नहीं।
क्यों पड़ती है जरूरत
- अचानक से ऊपर-नीचे सड़क पर गाड़ी का तेजी से उछलना
- तेजी रफ्तार में गड्ढे में टायर का घुसना
- मामली टक्कर या तेजी से ब्रेक मारना
- खराब सड़क पर तेजी से चलाना
कैसे चलेगा पता
- अगर कम रफ्तार पर आपकी कार का स्टीयरिंग बीच में रहने की बजाय एक तरफ जाने लगे
- स्टीयरिंग व्हील में वाइब्रेशन या हल्के झटके महसूस होने लगें
- अगर आपको लगे कि टायर एक तरफ से ज्यादा घिस रहा है
व्हील बैलेंसिंग
व्हील बैलेंसिंग असल में पहिया और टायर से संबंधित है। इससे पहिया और टायर के बीच जो असंतुलन होता है, उसे ठीक किया जाता है। इसमें वजन के जरिए दोनों के बीच समन्वय बनाया जाता है, जिससे स्मूद और स्टेबल ड्राइव मिलती है और झटके भी नहीं लगते हैं। असंतुलित टायरों से सस्पेंशन और व्हील्स को नुकसान होने का खतरा रहा है। वहीं व्हील बैलेंसिंग अकेले नहीं होती है, जब भी व्हील एलाइनमेंट कराएं, साथ में इसे भी कराएं।
कैसे होती व्हील बैलेंसिंग
- इसमें चारों टायर्स को निकाल कर कंप्यूटराइज्ड व्हील बैलेंसर पर लगाया जाता है
- चारों पहियों को कंप्यूटर के जरिए अलग-अलग चेक किया जाता है और कंप्यूटर अपनी गणना के हिसाब से वजन रखने का सुझाव देता है
- वजन असंतुलन को ठीक उसी जगह पर रिम पर काउंटरवेट रखकर ठीक किया जाता है जहां कंप्यूटर निर्देश देता है।
- इसके बाद व्हील्स को फिर से चेक किया जाता है, अगर एक टायर पर वजन 100 ग्राम से ज्यादा होता है तो आपको टायर या रिम बदलने के लिए कहा जा सकता है।
- आमतौर पर 6 से 8 हजार किमी पर व्हील एलाइनमेंट और बैलेंसिंग करानी चाहिए।
टायर रोटेशन
अगर व्हील बैलेंसिंग और एलाइनमेंट करवा रहे हैं, तो टायर रोटेशन भी जरूर करवा लें। इसकी वजह है कि चारों टायर एक साथ खराब नहीं होते, चाहे फोर व्हील ड्राइव, रिअर व्हील ड्राइव या फ्रट व्हील ड्राइव या फिर ऑल व्हील ड्राइव, सभी में आपको अगले टायर पीछे के मुकाबले ज्यादा घिसे हुए मिलेंगे। इसकी वजह है कि आगे इंजन का वजन होता है और ब्रेक लगाने से वजन सीधा टायरों पर पड़ता है। इसी लिए टायर एक्सपर्ट्स का कहना है कि टायर रोटेशन कराते रहना चाहिए, जिससे जल्दी टायर घिसने की समस्या से निजात मिलेगी और उनकी उम्र बढ़ेगी।